Vivah Badha Yog: क्या है विवाह बाधा योग, कब और कैसे बनता है कुंडली में, जानें विवाह की बाधाओं को दूर करने के उपाय

Vivah Badha Yog: क्या है विवाह बाधा योग, कब और कैसे बनता है कुंडली में, जानें विवाह की बाधाओं को दूर करने के उपाय

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Vivah Badha Yog kya Hai: अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों के विवाह को लेकर बहुत चिंतित रहते हैं। अगर बच्चों ने लव मैरिज भी कर ली है, तो उनका वैवाहिक जीवन ठीक चलेगा या नहीं, इसे लेकर भी माता-पिता काफी चिंतित रहते हैं।

ऐसें में उनकी चिंता दूर करने के लिए बालक और बालिका के कुंडली का विश्लेषण किया जाता है। इससे आसानी से पता किया जा सकता है कि उनके विवाह में देरी (Shadi na hone ke karan) यह वैवाहिक जीवन ठीक से न चलने का क्या कारण है। साथ ही इससे यह भी पता किया जा सकता है कि विवाह में आ रही बाधा (Vivah Badha Yog Hindi)और वैवाहिक जीवन को सुखद बनाने के लिए क्या उपाय हैं। जानते हैं ज्योतिषाचार्य पंडित अनिल पांडे (8959594400) से कि ग्रहों की कौन सी स्थितियों के चलते विवाह में बाधाएं आती हैं।

क्या है विवाह बाधा योग

विवाह होने में होने वाली परेशानी तथा वैवाहिक जीवन की परेशानी का मुख्य कारण विवाह बाधा योग है।

किस ग्रह की स्थिति पर निर्भर करता है विवाह बाधा योग

विवाह बाधा योग लड़के, लड़कियों की कुंडलियों में समान रूप से लागू होते हैं। इनमें अंतर केवल इतना होता है, कि लड़कियों की कुंडली में गुरू की स्थिति पर विचार तथा लड़कों की कुंडलियों में शुक्र की विशेष स्थिति पर विचार करना होता है।

कुंडली के इन ग्रहों की स्थिति खराब होने पर बिगड़ जाता है दांपत्य जीवन

  • यदि कुंडली में सप्तम भाव ग्रह रहित हो यानी इसमें कोई सा ग्रह न हो और सप्तमेश बलहीन हो, सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तो, ऐसे जातक को अच्छा पति/पत्नी मिल पाना संभव नहीं हो पाता है।
  • सप्तम भाव में बुध-शनि की युति होने पर भी दाम्पत्य सुख की हानि होती है। सप्तम भाव में यदि सूर्य, शनि, राहु-केतू आदि में से एकाधिक ग्रह हों अथवा इनमें से एकाधिक ग्रहों की दृष्टि हो तो, भी दाम्पत्य सुख बिगड़ जाता है।
  • यदि कुण्डली में सप्तम भाव पर शुभाशुभ ग्रहों का प्रभाव हो, तो पुनर्विवाह की संभावना रहती है। नवांश कुंडली में यदि मंगल या शुक्र का राशि परिवर्तन हो या जन्म कुंडली में चंद्र, मंगल, शुक्र संयुक्त रूप से सप्तम भाव में हों, तो ये योग चरित्रहीनता का कारण बनते हैं, और इस कारण दाम्पत्य सुख बिगड़ सकता है।
  • यदि जन्मलग्न या चंद्र लग्न से सातवें या आठवें भाव में पाप ग्रह हों, या आठवें स्थान का स्वामी सातवें भाव में हो, तथा सातवें भाव के स्वामी पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो, तो दाम्पत्य जीवन सुखी होने में बहुत बाधाएं आती हैं।
  • यदि नवम भाव या दशम भाव के स्वामी, अष्टमेश या षष्ठेश के साथ स्थित हों, तो दांपत्य जीवन में दरार आ सकती है।

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  • अगर लग्नेश तथा शनि बलहीन हों, चार या चार से अधिक ग्रह कुंडली में कहीं भी एक साथ स्थित हों अथवा द्रेष्काण कुंडली में चन्द्रमा शनि के द्रेष्काण में गया हो और नवांश कुंडली में मंगल के नवांश में शनि हों और उस पर मंगल की दृष्टि हो, तो भी वैवाहिक जीवन में विभिन्न परेशानियां आती हैं।
  • सूर्य, गुरू, चन्द्रमा में से एक भी ग्रह बलहीन होकर लग्न में दशम में या बारहवें भाव में हो और बलवान शनि की पूर्ण दृष्टि में हो, तो ये योग जातक या जातिका को सन्यासी प्रवृत्ति देते हैं। या फिर वैराग्य भाव के कारण अलगाव की स्थिति आ जाती है और विवाह की ओर उनका लगाव बहुत कम होता है।
  • यदि सप्तम भाव में शनि और बुध एक साथ हों और चंद्रमा विषम राशि में हो, तो दाम्पत्य जीवन कलहयुक्त बनता है और अलगाव की संभावना होती है।
  • यदि शुक्र, सूर्य तथा चंद्रमा पुरूषों की कुंडली में तथा सूर्य, गुरू, चंद्रमा, महिलाओं की कुंडली में एक ही नवांश में हों तथा छठवें, आठवें तथा बारहवें भाव में हों, तो भी विवाह में कई तरह की बाधाएं आती हैं।

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इन ग्रहों के कारण नहीं होती शादी

यदि जातिका की कुण्डली में सप्तम भाव, सप्तमेश एवं गुरू तथा जातक की कुण्डली में सप्तम भाव सप्तमेश एवं शुक्र पाप प्रभाव में हों तथा द्वितीय भाव का स्वामी छठवें, आठवें या बारहवें भाव में हो, तो इस योग वाले जातक-जातिकाओं को अविवाहित रह जाना पड़ता है।

शुक्र, गुरू बलहीन हों या अस्त हों, सप्तमेश भी बलहीन हो या अस्त हो, तथा सातवें भाव में राहू एवं शनि स्थित हों, तो विवाह होने में बहुत परेशानी होती है।

लग्न, दूसरा भाव और सप्तम भाव पाप ग्रहोें से युक्त हों, और उन पर शुभ ग्रह की पूर्ण दृष्टि न हो, तो भी विवाह होने में बहुत ज्यादा परेशानी हो सकती है।

इस स्थिति में भाग्यशाली मानी जाती हैं ये लड़कियां

यदि लग्नेश भाग्य भाव में हो तथा नवमेश पति स्थान में स्थित हो, तो ऐसी लड़की भाग्यशाली पति के साथ स्वयं भाग्यशाली होती है। उसको अपने कुटुम्बी सदस्यों द्वारा एवं समाज द्वारा पूर्ण मान-सम्मान दिया जाता है। इसी प्रकार यदि लग्नेश, चतुर्थेश तथा पंचमेश त्रिकोण या केंद्र में स्थित हों तो भी उपरोक्त फल प्राप्त होता है।

वैवाहिक समस्याओं को दूर करने के उपाय

इस प्रकार ज्योतिषीय ग्रंथों में अनेकानेक कुयोग मिलते हैं जो या तो विवाह होने ही नहीं देते हैं, अथवा विवाह हो भी जाए तो दाम्पत्य सुख को तहस-नहस कर देते हैं।

विवाह के बाद आ रही समस्याओं से निपटने के लिए पूरी कुंडली का विश्लेषण करना आवश्यक होता है। कुंडली के विश्लेषण के पश्चात उचित पूजा पाठ या अन्य प्रभावी उपाय किए जा सकते हैं।

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