Vishwakarma Jayanti 2021 Muhurta Story : जानिए क्यों की जाती है विश्वकर्मा जयंती पर औजारों की पूजा

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नई दिल्ली। शुक्रवार का दिन कई त्योहारों का Vishwakarma Jayanti 2021 Muhurta Story संगम लेकर आया है। इस दिन विश्वकर्मा जयंती, वामन प्रकटोत्सव व डोल ग्यारस भी है। इसे लेकर श्रद्धालुओं में बड़ा उत्साह है। विश्व के सबसे बड़े इंजीनियर भगवान विश्वकर्मा की जयंती मनाई जाएगी।
तो वहीं वामन भगवान का प्रकटोत्सव भी मनाया जाएगा। माना जाता है कि इस दिन ही ऋषि विश्वकर्मा का जन्म हुआ था। इस दिन इंजीनियरिंग संस्थानों व फैक्ट्रियों, कल-कारखानों व औजारों की पूजा की जाती है।

भगवान विश्वकर्मा को विश्व का सबसे बड़ा व प्रकाट इंजीनियर माना जाता है। ​किसी भी काम को करने के लिए औजारों का उपयोग किया जाता है। इसलिए इस दिन औजारों और मशीनों की पूजा का विशेष महत्व है।

स्वर्ग लोक बनाया भगवान परशुराम ने
पंडित रामगोविन्द शास्त्री के अनुसार Vishwakarma Jayanti 2021 Date भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का सबसे बड़ा इंजीनियर और वास्तुकार माना जाता है। धार्मिक मान्यता के उन्होंने ही इंद्रपुरी, द्वारिका, हस्तिनापुर, स्वर्गलोक, लंका, जगन्नाथपुरी, भगवान शंकर का त्रिशुल, विष्णु का सुदर्शन चक्र आदि का निर्माण किया था।

पौराणिक शास्त्रों में भगवान विश्वकर्मा का महत्व
ज्योतिषाचार्यो की मानें तो पौराणिक कथाओं के अनुसार इस समस्त ब्रह्मांड की रचना भी विश्वकर्मा जी ने की है। ऋग्वेद के 10 वे अध्याय के 121 वे एक सूक्त लिखा है। जिसके अनुसार विश्वकर्मा जी के द्वारा ही धरती, आकाश और जल की रचना की गई है। विश्वकर्मा पुराण के अनुसार आदि नारायण ने सर्वप्रथम ब्रह्मा जी और फिर विश्वकर्मा जी की रचना की।

मां पार्वती के महल का निर्माण कराया था शिवजी ने

मां पार्वती के लिए भगवान शिव ने एक महल का निर्माण करवाने की सोची। जिसकी जिम्मेदारी भी शिवजी ने भगवान विश्वकर्मा को ही दी। तब भगवान विश्वकर्मा मां पार्वती के लिए सोने का महल बना दिया और इसकी पूजा के लिए भगवान शिव ने रावण का बुलाया था। पर महल को देखकर रावण इतना आकर्षित हुआ कि दक्षिणा में वही महल ही मांग लिया था। इस दौरान भगवान शिव महल रावण को सौंपकर कैलाश पर्वत पर चले गए थे। इसके अलावा भगवान विश्वकर्मा ने पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ, कौरव वंश के हस्तिनापुर और भगवान कृष्ण के द्वारका का निर्माण भी किया था।

सभी पौराणिक रचनाएं इन्हीं की देन
ऐसी मान्यता है ​कि सभी पौराणिक संरचनाएं, भगवान विश्वकर्मा द्वारा ही की गई हैं। इनका जन्म देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन के दौरान माना जाता है। देवी—देवताओं के Vishwakarma Jayanti 2021 Date सभी और शस्त्र भगवान विश्वकर्मा की ही देन हैं। यहां तक की ऐसा माना जाता है कि वज्र का निर्माण भी इन्हीं के द्वारा किया है। इतना ही नहीं लंका का निर्माण भी इन्हीं के द्वारा माना जाता है।

पूजा विधि
इस दिन विशेष रूप से मशीनों और औजारों का पूजन जरूर किया जाता है। इसके लिए सुबह स्नान-ध्यान के बाद अपने औजारों, मशीन आदि की सफाई करके विश्वकर्मा जी की प्रतिमा की पूजा करें। उन्हें फल-फूल चढ़ाएं। पूजा के दौरान “ॐ विश्वकर्मणे नमः” मंत्र का एक माला जप अवश्य करें। मंत्र समाप्त होने पर इसी मंत्र से हवन करके भगवान विश्वकर्मा की आरती करें व प्रसाद वितरित करें।

मुहूर्त और पंचांग

राहुकाल समय —
शुक्रवार सुबह 10.30 बजे से दोपहर 12 बजे तक राहुकालम।

17 सितंबर का पंचांग :
दिन- शुक्रवार
26 भाद्रपद (सौर) शक 1943
2 आश्विन मास प्रविष्टे 2078
9 सफर सन हिजरी 1443
भाद्रपद शुक्ल एकादशी सुबह 8.08 बजे इसके बाद द्वादशी तिथि प्रारंभ हो जाएगी।
श्रवण नक्षत्र — रात 3.36 बजे तक इसके बाद धनिष्ठा नक्षत्र
अतिगण्ड योग — रात 8.20 बजे तक पश्चात सुकर्मा योग
भद्रा (करण) सुबह 8.08 बजे तक
चंद्रमा मकर राशि में (दिन-रात)

विश्वकर्मा पूजा विधि:
इस ​दिन ऑफिस, फैक्ट्री, वर्कशॉप, दुकान आदि में सुबह स्नान करके भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा, यंत्रों व औजारों की विधिपूर्वक पूजा करना चाहिए।

पूजा विधि —
सबसे पहले चौकी पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा स्थापित करें। अब कलश को हल्दी, चावल व रक्षासूत्र चढ़ाएं।

पूजा मंत्र —
‘ॐ आधार शक्तपे नम:
ॐ कूमयि नम:
‘ॐ अनन्तम नम:’
‘पृथिव्यै नम:’

पूजन स्थान पर हल्दी, अक्षत, रोली लगाकर भगवान विश्वकर्मा को चंदन, धूप, अगरबत्ती, दही, रोली, सुपारी, रक्षा सूत्र, मिठाई, फल आदि अर्पित करें। धूप दीप से आरती करें। पूजन सामग्री हथियारों पर भी चढ़ाएं। अंत में भगवान विश्वकर्मा को प्रणाम कर प्रसाद बांटें।

विश्वकर्मा पूजा की कथा और महत्व-
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि को संवारने की जिम्मेदारी ब्रह्मा जी ने भगवान विश्वकर्मा को सौंपी थी। ब्रह्मा जी को अपने वंशज और भगवान विश्वकर्मा की कला पर पूर्ण विश्वास था। जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया तो वह एक विशालकाय अंडे के आकार की थी। उस अंडे से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई। कहते हैं कि बाद में ब्रह्माजी ने इसे शेषनाग की जीभ पर रख दिया।
शेषनाग के हिलने से सृष्टि को नुकसान होता था। इस बात से परेशान होकर ब्रह्माजी ने भगवान विश्वकर्मा से इसका उपाय पूछा। भगवान विश्वकर्मा ने मेरू पर्वत को जल में रखवा कर सृष्टि को स्थिर कर दिया। भगवान विश्वकर्मा की निर्माण क्षमता और शिल्पकला से ब्रह्माजी बेहद प्रभावित हुए। तभी से भगवान विश्वकर्मा को दुनिया का पहला इंजीनियर और वास्तुकार मनाते हैं। भगवान विश्वकर्मा की छोटी-छोटी दुकानों में भी पूजा की जाती है।

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