Virtual Autopsy : क्या आप जानते है शव को चीड़-फाड़ के बिना भी करते है ऐसे जांच ! जानिए इस तकनीक के बारे में

मशहूर कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव (Raju Srivastava) के पोस्टमार्टम को लेकर किया गया था यानि कि, इस 'वर्चुअल ऑटोप्सी' तकनीक के आने से अब शव की जांच बिना चीड़फाड़ के की जा सकेगी।

Virtual Autopsy : क्या आप जानते है शव को चीड़-फाड़ के बिना भी करते है ऐसे जांच ! जानिए इस तकनीक के बारे में

Virtual Autopsy : ये नाम सुनने में जहां पर आपको नया लग रहा है वहीं पर हाल ही में इसका प्रयोग मशहूर कॉमेडियन राजू श्रीवास्तव (Raju Srivastava) के पोस्टमार्टम को लेकर किया गया था यानि कि, इस 'वर्चुअल ऑटोप्सी' तकनीक के आने से अब शव की जांच बिना चीड़फाड़ के की जा सकेगी।आइए इसके बारे में जानते हैं…

जानिए वर्चुअल ऑटोप्सी क्या होती है?

जैसा कि, वर्चुअल तरीके से पोस्टमार्टम की बात की जाए तो इसमें शव की पूरी जांच मशीन की मदद से की जाती है। इस प्रोसेस में नॉर्मल पोस्टमार्टम की तरह कोई चीर-फाड़ नहीं होती है। फोरेंसिक डॉक्टर्स हाई टेक डिजिटल एक्सरे और एमआरआई मशीन का इस्तेमाल करते हैं। इससे धार्मिक भावनाएं आहत होने का खतरा भी नहीं होता और मौत की वजह को लेकर ज्यादा अच्छा अंदाजा मिल जाता है। इसे लेकर डॉक्टर जानकारी में बताते है कि, इसके जरिए पोस्टमार्टम करने के लिए कम समय लगता है, जिससे शव को अंतिम संस्कार के लिए जल्दी भेजा जा सकता है। यह प्रकार की ऐसी तकनीक है कि, वर्चुअल ऑटोप्सी एक रेडियोलॉजिकल परीक्षण है। इसमें उन फ्रैक्चर, खून के थक्के और चोटों का भी पता चल जाता है, जिन्हें आंखों से नहीं देख सकते। इस प्रोसेस की मदद से ब्लीडिंग के साथ-साथ हड्डियों में हेयरलाइन या चिप फ्रैक्चर जैसे छोटे फ्रैक्चर का भी आसानी से पता चल जाता है। इन्हें एक्सरे के रूप में रखा जा सकता है, जो आगे जाकर कानूनी सबूत बन सकते हैं।

जानें देश में कब आई ये तकनीक

आपको बताते चलें कि, भारत में वर्चुअल ऑटोप्सी 2020 में शुरू हुई। 2019 में राज्य सभा में तब के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कहा था- व्यक्ति की मौत के बाद परिवार के कई लोग नॉर्मल पोस्टमार्टम कराने से हिचकिचाते हैं। वर्चुअल ऑटोप्सी समय और पैसे दोनों की ही बचत करती है। यहां पर 30 मिनट में ही शव का परीक्षण हो जाता है। यहां पर इस परीक्षण एम्स को इस प्रोजेक्ट के लिए 5 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे। एम्स में हर साल 3 हजार पोस्टमार्टम होते हैं। केस की जटिलता के आधार पर प्रोसेस में 3 दिन का समय भी लग जाता है। आपको बताते चलें कि, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और स्विट्जरलैंड जैसे देश में पहले से तकनीक प्रयोग में ली जा रही है।

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