एक पत्नी ने पति द्वारा किडनी दान देने को अपना पाप समझकर प्रेमानंद महाराज से पूछा कि क्या यह उसके कर्मों का परिणाम है। महाराज ने त्याग, प्रेम और कर्म का अर्थ समझाते हुए बताया कि पति का निःस्वार्थ प्रेम किसी भी पाप से बड़ा है और यह पुण्य का कार्य है।
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