"क्या आपने कभी ऐसी भक्ति देखी है जहाँ शरीर साथ छोड़ दे, लेकिन पैर प्रभु की राह न छोड़ें? पूज्य प्रेमानंद महाराज ने एक ऐसे परम भक्त का वृत्तांत सुनाया, जिसके पैर गल रहे थे, कीड़े पड़ चुके थे और असहनीय पीड़ा थी। दुनिया जिसे देख कर मुँह मोड़ रही थी, वो भक्त अपनी मस्ती में झूम रहा था! महाराज बताते हैं कि जब मन पूरी तरह से राधा-नाम में रम जाता है, तो देह का दुख बोना पड़ जाता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि भक्ति कोई बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि वह आंतरिक शक्ति है जो मौत के सामने भी आपको मुस्कुराना सिखा देती है। आज के इस दौर में, क्या हम अपनी छोटी सी परेशानी में भी उस प्रभु पर ऐसा अटूट विश्वास रख पाते हैं? सोचिएगा जरूर!"
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