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Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने जाति और धर्म के आधार पर की जा रही राजनीति को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि मौजूदा कानून में जाति और धर्म की राजनीति पर रोक लगाने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। इसी के साथ हाईकोर्ट ने जातीय रैली के खिलाफ दाखिल याचिका का निस्तारण कर दिया है।
मौजूदा कानून में प्रतिबंध का अभाव
हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपने आदेश में कहा कि वर्तमान कानूनी ढांचे में किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल को केवल जाति या धर्म के आधार पर चुनाव लड़ने से रोका नहीं जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक संसद इस संबंध में कोई ठोस कानून नहीं बनाती, तब तक अदालत या चुनाव आयोग इस पर कार्रवाई करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। Lucknow Bench Order on Caste Religion Politics
चुनाव आयोग के अधिकारों पर स्पष्ट रुख
लखनऊ बेंच ने कहा कि EC के पास किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार नहीं है, जब तक कि इसके लिए कानून में स्पष्ट प्रावधान न हो। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग केवल कानून के दायरे में पहकर ही कार्य कर सकता है और अपने स्तर पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं कर सकता है।
अयोग्यता केवल कानून के तहत ही संभव
अदालत ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) की धारा 8ए का हवाला देते हुए कहा कि किसी जनप्रतिनिधि को केवल इसी प्रावधान के तहत अयोग्य ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अयोग्यता तभी लग सकती है, जब किसी मामले में व्यक्ति को अदालत द्वारा दोषी करार दिया जाए। केवल आरोप या राजनीतिक गतिविधियों के आधार पर अयोग्यता नहीं लगाई जा सकती।
विधायिका को कानून बनाने की जरूरत
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी टिप्पणी की कि यदि जाति और धर्म के नाम पर हो रही राजनीति पर रोक लगानी है, तो इसके लिए विधायिका को कानून बनाना होगा। अदालत ने कहा कि यह नीति निर्धारण का विषय है और इसे न्यायपालिका के बजाय संसद द्वारा तय किया जाना चाहिए।
पुरानी याचिका पर आया फैसला
यह आदेश स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव की ओर से दाखिल याचिका पर दिया गया है। याचिका वर्ष 2013 में दायर की गई थी, जिसमें जातीय रैलियों और जाति आधारित राजनीति पर रोक लगाने की मांग की गई थी। इस याचिका पर मंगलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने विस्तृत सुनवाई के बाद अपना आदेश सुनाया।
चुनाव आयोग को दिए गए निर्देश
कोर्ट ने अपने आदेश के साथ चुनाव आयोग को भी निर्देश दिए हैं कि वह अपने अधिकार क्षेत्र में रहते हुए कानून के अनुसार कार्य करे। साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जाति और धर्म की राजनीति पर प्रभावी नियंत्रण के लिए अलग और स्पष्ट कानून बनाए जाने की आवश्यकता है।
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