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Tsewang Paljor: 25 साल से एवरेस्ट की चोटी पर सो रहा है ITBP का जवान!, लोग ग्रीन बूट्स से करते हैं उनकी पहचान

Tsewang Paljor: 25 साल से एवरेस्ट की चोटी पर सो रहा है ITBP का जवान!, लोग ग्रीन बूट्स से करते हैं उनकी पहचान Tsewang Paljor: ITBP jawans have been sleeping on the top of Everest for 25 years, people identify them with green boots nkp

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Bansal Digital Desk
Tsewang Paljor: 25 साल से एवरेस्ट की चोटी पर सो रहा है ITBP का जवान!, लोग ग्रीन बूट्स से करते हैं उनकी पहचान

नई दिल्ली। माउंट एवरेस्ट को दुनिया की सबसे ऊंची और सबसे खतरनाक चोटी माना जाता है। लोगों का सपना होता है एवरेस्ट फतह करना। पहली बार इसे 29 मई 1953 को दो लोगों ने (एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नॉर्ग) फतह किया था। इसके बाद इस चोटी पर पहुंचने वालों की लिस्ट लंबी होती चली गई। हर साल यहां अप्रैल के अंत या फिर मई में बड़ी संख्या में पर्वतारोही पहुंचते हैं। इन्हीं में से एक थे 'शेवांग पलजोर'।

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25 साल से पड़ा है उनका शव

शेवांग पलजोर के बारे में कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि माउंट एवरेस्ट की चोटी से दो-तीन सौ मीटर नीचे उनका शव 25 साल से पड़ा है। पर्वातारोही बताते हैं कि उनके शव को देखकर लगता है जैसे वो थक कर सो गए हो। अगर कोई उनके बारे में नहीं जानता तो ये कोई नहीं कह सकता कि वो एक लाश है। पर्वतारोही, शेवांग पलजोर के शव की पहचान उसके हरे जूते से करते हैं। लोग शेवांग को ग्रीन बूट्स के नाम से भी जानते हैं।

कौन थे शेवांग पलजोर

शेवांग पलजोर, ITBP के जवान और भारतीय पर्वतारोही थे। वो 10 मई 1996 को अपने साथियों के साथ माउंट एवरेस्ट को फतह करने निकले थे। इस दौरान आए एक बर्फीले तूफान में उनकी मौत हो गई। उनकी मौत को लेकर आज भी विवाद है। क्योंकि कई पर्वतारोहियों का मानना है कि अगर उनकी मदद की जाती तो वे तूफान से बच सकते थे। बर्फीले तूफान के बाद वो और उनका एक साथी मदद की गुहार लगाते रहे, वहां कई पर्वतारोही मौजूद थे, लेकिन एवरेस्ट जीतने की चाहत में किसी ने उनकी मदद नहीं की। उस घटना के बाद से लेकर आज तक उनका शव वहीं पड़ा है।

आईटीबीपी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया

शेवांग की मां ताशी एंगमो कहती हैं कि ITBP ने तो पहले उन्हें सही जानकार नहीं दी थी, उन्होंने उनसे सिर्फ इतना कहा था कि उनका बेटा एवरेस्ट पर लापता हो गया है। लेकिन बाद में उन्हें किसी से पता चला कि उनके बेटे का शव एवरेस्ट पर पड़ा है। वो लद्दाख में आईटीबीपी के दफ्तर का चक्कर लगाती रहीं। लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई।

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एवरेस्ट पर लाशें बताती हैं रास्ता

माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई 8,848 मीटर के करीब है। इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन बहुत ही कम रहती है, जिस वजह से दिमाग और फेफड़े की नशें फटने लगती हैं। एवरेस्ट पर सबसे ज्यादा मौतें 8000 मीटर के ऊपर वाले हिस्से में होती है, इसलिए इसे डेथ जोन भी कहते हैं। वहीं बर्फीले तूफान भी कई पर्वतारोहियों की जान ले चुके हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 तक 308 पर्वतारोहियों की मौत एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान हुई है। उतनी ऊंचाई से शव को लाना नामुमकिन है, इसलिए ज्यादातर पर्वतारोही अपने साथियों की लाश वहीं छोड़ आते हैं। एवरेस्ट पर सामान्य तापमान माइनस 16 से माइनस 40 तक रहता है। जिस वजह से ये एक डीप फ्रीजर की तरह काम करता है और लाशें सड़ती नहीं हैं। इन लाशों की पहचान पर्वतारोही कपड़ों और जूतों से करते हैं। साथ ही लाशों की मदद से अब रास्ते की पहचान होने लगी है।

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