कृषि कानूनों से संबंधित समिति की पहली प्रत्यक्ष बैठक 19 जनवरी को हो सकती है: सदस्य घनवट

(लक्ष्मी देवी)

नयी दिल्ली, 14 जनवरी (भाषा) कृषि कानूनों पर उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति अपनी पहली प्रत्यक्ष बैठक 19 जनवरी को यहां पूसा परिसर में कर सकती है।

समिति के सदस्य अनिल घनवट ने बृहस्पतिवार को यह बात कही और इस बात पर जोर दिया कि अगर समिति को किसानों से बातचीत करने के लिए उनके प्रदर्शन स्थल पर जाना पड़ा तो वह इसे ‘प्रतिष्ठा या अहम का मुद्दा’ नहीं बनाएगी।

समिति के सदस्यों को आज दिन में डिजिटल तरीके से वार्ता करनी थी, लेकिन पूर्व सांसद और किसान नेता भूपिंदर सिंह मान के समिति से अलग हो जाने के बाद बैठक नहीं हो सकी।

घनवट ने कहा कि समिति के मौजूदा सदस्य अपनी डिजिटल बैठक अब शुक्रवार को कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह तब तक समिति की सदस्यता नहीं छोड़ेंगे जब तक कि शीर्ष अदालत इसके लिए नहीं कहती।

उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि अन्य कोई सदस्य समिति से दूरी बनाएगा।

उच्चतम न्यायालय ने नये कृषि कानूनों के मसले पर अध्ययन के लिए 11 जनवरी को चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। इन कानूनों के खिलाफ खासतौर पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों के कृषक दिल्ली की सीमाओं पर 40 दिन से अधिक समय से प्रदर्शन कर रहे हैं।

शीर्ष अदालत ने समिति को दस दिन के भीतर पहली बैठक आयोजित करने का और दो महीने में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था।

घनवट ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिये साक्षात्कार में कहा, ‘‘पहली बैठक 20 जनवरी से पहले करनी होगी। यह मौजूदा सदस्यों के साथ होगी। पूरी संभावना है कि बैठक पूसा परिसर में 19 जनवरी को होगी।’’

जब उनसे पूछा गया कि क्या समिति मौजूदा सदस्यों के साथ काम करती रहेगी, इस पर उन्होंने कहा, ‘‘मौजूदा तीन सदस्यीय समिति तब तक काम करती रहेगी जब तक उच्चतम न्यायालय एक अन्य सदस्य को शामिल करने का निर्देश नहीं देता।’’

घनवट महाराष्ट्र के किसान संगठन शेतकरी संगठन के अध्यक्ष हैं।

समिति के सदस्यों की पूर्व निर्धारित डिजिटल बैठक के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘‘क्योंकि मान ने खुद को समिति से अलग कर लिया, इसलिए बैठक नहीं हो सकी। यह कल हो सकती है।’’

समिति के सदस्यों को डिजिटल बातचीत में 20 जनवरी से पहले प्रथम बैठक के आयोजन के बारे में फैसला करना था।

समिति से अन्य सदस्यों के इस्तीफा देने की संभावना के प्रश्न पर घनवट ने कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय ने मुझे नियुक्त किया है। मैं समिति को नहीं छोड़ूंगा। मुझे नहीं लगता कि अन्य सदस्य भी छोड़ेंगे। लेकिन सबकी अपनी राय है और वे उसके हिसाब से काम करने के लिए स्वतंत्र हैं।’’

कुछ प्रदर्शनकारी किसान संघों ने आरोप लगाया है कि समिति के सदस्य कृषि कानूनों के समर्थक रहे हैं, इस बारे में पूछे जाने पर घनवट ने कहा, ‘‘मुझे नहीं पता कि उच्चतम न्यायालय ने हमें किन मानदंडों पर चुना है। उसने हमारा ट्रैक रिकार्ड देखा होगा। मैं उनके फैसले का सम्मान करता हूं।’’

उन्होंने प्रदर्शनकारी किसानों का भी शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि उनके आंदोलन की वजह से खेती की बात पहली बार इस स्तर पर हो रही है, अन्यथा किसानों को हमेशा हल्के में लिया जाता रहा है।

घनवट ने कहा, ‘‘उनकी वजह से एक अच्छा कानून बनाने का अवसर मिला है। मैं गौरवान्वित हूं कि मुझे काम करने का अवसर मिला।’’

उच्चतम न्यायालय द्वारा समिति के गठन के बाद भी सरकार के प्रदर्शनकारी किसानों से बातचीत जारी रखने और 15 जनवरी को प्रस्तावित वार्ता पर घनवट ने कहा, ‘‘मुझे लगता है कि यह उनकी सरकार के साथ अंतिम बैठक होगी। वे कहेंगे कि इसके बाद आपको (किसानों को) समिति के साथ बात करनी है जो उच्चतम न्यायालय को रिपोर्ट देगी।’’

प्रदर्शनकारी किसानों के समिति की कार्यवाही में भाग लेने की अनिच्छा के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ‘‘हम उनके समक्ष जाएंगे। हम उनके भाई हैं। हमने पहले साथ में काम किया है। हम उन तक पहुंचेंगे, उनके साथ बैठेंगे और इस मुद्दे पर विचार-विमर्श करेंगे। कोई समस्या नहीं है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हमें बातचीत के लिए उनके पास जाने में ना कोई डर है और ना ही हमें कोई संकोच है। प्रतिष्ठा का कोई विषय नहीं है। मैं पूरे जीवन किसान कल्याण के लिए काम करता रहा हूं। प्रदर्शन स्थल पर बैठे लोगों ने किसानों के हित के लिए अपनी जान गंवा दी। अगर हमारा इरादा और लक्ष्य एक है तो अहम या प्रतिष्ठा की कोई बात नहीं है।’’

क्या किसानों का पक्ष निष्पक्षता से सुना जाएगा, इस पर उन्होंने कहा, ‘‘बिल्कुल। हमारा कर्तव्य उनकी मांगों को सुनना और उच्चतम न्यायालय के समक्ष रखना है। इस बारे में सुझाव दिये जाएंगे कि उनकी मांगों को कैसे पूरा किया जा सकता है। हम उन्हें संतुष्ट करने का हरसंभव प्रयास करेंगे और हम उन्हें ऐसा महसूस नहीं होने देंगे कि उन्हें मूर्ख बनाया गया है। मुझे विश्वास है कि बातचीत के दौरान प्रदर्शनकारी किसान कहेंगे कि इन कानूनों को लागू किया जाए।’’

भाषा वैभव उमा

उमा

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