आप सरकार के समक्ष 2020 में कोविड-19 महामारी, दंगों के बाद की स्थिति से निपटने की थी चुनौती

(विनोद त्रिपाठी)

नयी दिल्ली, दो जनवरी (भाषा) कोविड-19 महामारी के चलते 2020 किसी भी सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण वर्ष था, लेकिन दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार को कहीं अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। पार्टी ने बीते साल की शुरूआत में ऐसे वक्त राष्ट्रीय राजधानी की सत्ता की बागडोर संभाली, जब कोरोना वायरस महामारी भारत में दस्तक दे रही थी तथा संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के खिलाफ यहां विरोध प्रदर्शन के चलते तनाव का माहौल था।

अरविंद केजरीवाल ने 16 फरवरी को तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। इसके कुछ दिनों बाद ही दिल्ली के उत्तरपूर्वी जिले में सांप्रदायिक दंगे हुए, जिनमें 50 से अधिक लोगों की जान चली गई, बड़ी संख्या में लोग घायल हुए और करोड़ों रुपये मूल्य की सार्वजनिक एवं निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा।

केजरीवाल सरकार सांप्रदायिक हिंसा के बाद जब राहत एवं पुनर्वास कार्य चला रही थी, तभी उसके समक्ष कोविड-19 महामारी एक और चुनौती बनकर उभरी। कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने मार्च के तीसरे सप्ताह में देशव्यापी लॉकडाउन लागू कर दिया।

लॉकडाउन के चलते दिल्ली से बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक अपने मूल स्थानों की ओर लौटने लगे, तभी आप सरकार ने स्थिति को संभाला। सरकार ने इसके लिए विभिन्न स्थानों पर अस्थायी आश्रय गृह बनाए और जरूरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था की।

पूरी दिल्ली में खोले गए इस तरह के सैकड़ों केंद्रों में जरूरतमंदों को मुफ्त भोजन मुहैया कराया गया, जबकि आप सरकार ने लगभग 71 लाख लोगों को मुफ्त राशन वितरित किया।

गर्मियों के महीनों के दौरान संक्रमण के मामलों और संक्रमण से होने वाली मौतों की बढ़ती संख्या को देखते हुए केजरीवाल सरकार ने ‘दिल्ली मॉडल’ पेश किया। इसके तहत संक्रमितों का पता लगाने, जांच करने और घर पर पृथकवास के साथ-साथ प्लाज्मा थेरेपी (उपचार की पद्धति) पर जोर दिया गया।

जांच क्षमता को बढ़ाना, संक्रमितों के लिए अधिक अस्पताल और बिस्तर उपलब्ध कराना, साजोसामान और स्वास्थ्य कर्मचारियों सहित एक विशाल कार्यबल की व्यवस्था करना कुछ ऐसे कार्य थे, जिनमें दिल्ली सरकार 2020 के दौरान जुटी रही।

जून महीने में अनलॉक प्रक्रिया शुरू होने पर आप सरकार के समक्ष बाजारों, उद्योगों और सेवा क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के महीनों तक बंद रहने के कारण राजस्व में आई कमी और दिल्ली की बुरी तरह से प्रभावित अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने की एक और बड़ी चुनौती थी।

केजरीवाल सरकार ने मार्च में वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए 65,000 करोड़ रुपये का बजट पेश किया, जो कि 2019-20 में 60,000 करोड़ रुपये के बजट अनुमानों से 8 प्रतिशत अधिक था।

हालांकि, कर राजस्व में कमी और आर्थिक गतिविधियों में आए ठहराव से मई में दिल्ली सरकार को अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिए केंद्र से 5,000 करोड़ रुपये का अनुदान की मांग करने को मजबूर होना पड़ा। सितंबर में राजस्व संग्रह में 50 प्रतिशत से अधिक की कमी आई थी।

वित्तीय संकट के कारण विभिन्न परियोजनाओं और कार्यक्रमों की प्रगति में बाधा आने का जिक्र करते हुए केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री एवं वित्त मंत्री मनीष सिसोदिया ने केंद्र से जीएसटी की कमी की भरपाई करने को कहा।

दिल्ली सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिए शराब की बिक्री पर 70 प्रतिशत का विशेष शुल्क, पेट्रोल और डीजल पर वैट में बढ़ोतरी जैसे कुछ कदम उठाये।

दिल्ली की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए दिल्ली सरकार ने लॉकडाउन की पाबंदियां हटाने की वकालत की। साथ ही केजरीवाल सरकार ने आर्थिक गतिविधियों को फिर से शुरू करने के लिए उद्योगों और बाजारों की मदद के लिए कदम उठाए।

सरकार ने ‘रोज़गार बाज़ार’ रोजगार पोर्टल शुरू किया, होटल और रेस्तरां को 24 घंटे काम करने की अनुमति दी और औद्योगिक एवं वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को निर्धारित शुल्क में राहत दी।

परिवहन क्षेत्र में, दिल्ली सरकार ने अगस्त में अपनी महत्वाकांक्षी इलेक्ट्रिक वाहन नीति को अधिसूचित किया, जिसका लक्ष्य है कि 2024 तक दिल्ली में सभी नए वाहनों की बिक्री में इलेक्ट्रिक वाहन बाजार की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत हो।

परिवहन विभाग ने भी अधिक बसों की खरीद के लिए कदम उठाये, जिसमें ई-बसें भी शामिल थीं। साथ ही ई-टिकट की व्यवस्था भी शुरू की गई।

भाषा अमित सुभाष

सुभाष

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