Success Story Of Harshvardhan: 350 रुपए से स्टार्टअप शुरू कर तय किया करोड़ों का सफ़र, जानिए भोपाल के हर्षवर्धन की सक्सेस स्टोरी

Success Story Of Harshvardhan: भोपाल के हर्षवर्धन मिश्र की कहानी आज हर इंसान के लिए एक प्रेरणा बन चुकी है. इन्होंने 350 रुपए से ‘go easy’...

Success Story Of Harshvardhan: 350 रुपए से स्टार्टअप शुरू कर तय किया करोड़ों का सफ़र, जानिए भोपाल के हर्षवर्धन की सक्सेस स्टोरी

Success Story Of Harshvardhan: भोपाल के हर्षवर्धन मिश्र की कहानी आज हर इंसान के लिए एक प्रेरणा बन चुकी है. इन्होंने 350 रुपए से ‘go easy’ नाम से स्टार्टअप शुरू किया था. आज उनकी कंपनी का सालाना टर्नओवर करीब 5 करोड़ रूपए हैं.

हर्षवर्धन कहते हैं कि आजकल खाना मंगवाने से लेकर, कपड़ा खरीदने, इलेक्ट्रीशियन, कारपेंटर, प्लंबर तक, या फिर कहीं जाना है तो ऑनलाइन बुकिंग यानी हर तरह की जरूरतों के लिए अब हमारी आदत ऑनलाइन हो गई है, लेकिन अभी भी इलेक्ट्रीशियन, कारपेंटर, प्लंबर, ब्यूटीशियन जैसी कुछ होम सर्विसेज सिर्फ बड़े शहरों में ही ऑनलाइन मिल रही है. इसी सॉल्यूशन पर हम काम कर रहे हैं.

2017 में शुरू किया स्टार्टअप

हर्षवर्धन कहते हैं कि ‘2016-17 का साल था. इंजीनियरिंग करने के बाद दिल्ली में जॉब कर रहा था. करीब ढाई साल तक मैंने प्राइवेट कंपनी में नौकरी की लेकिन वहां पर न तो इज्जत मिलती थी और न पैसा. अचानक मैंने नौकरी छोड़ दी और भोपाल आ गया. हर्षवर्धन कहते हैं, ‘मेरे कॉलेज का एक जूनियर है. जब उसके पास कोई काम नहीं था, तो उसने कहा कि वो जमशेदपुर में मेरे साथ काम करना चाहता है. जिसके बाद मैंने जूनियर के साथ मिलकर जमशेदपुर में ऑनलाइन होम सर्विस प्रोवाइड कराना शुरू किया.

मिश्रा अभी भोपाल और जमशेदपुर में ऑनलाइन होम सर्विसेज प्रोवाइड करा रहे हैं. हर्षवर्धन इलेक्ट्रीशियन, कारपेंटर, ब्यूटीशियन समेत 6 से ज्यादा ऑनलाइन सर्विसेज दे रहे हैं. 2017 में इन्होंने 350 रुपए से ‘go easy’ नाम से स्टार्टअप शुरू किया था. आज उनकी कंपनी का सालाना टर्नओवर करीब 5 करोड़ है.

पूरे काम को जानने में लगे 6 महीने

हर्षवर्धन ने बताया कि ‘एक रोज घर में इलेक्ट्रीशियन और प्लंबर की एक साथ जरूरत पड़ गई, लेकिन उस वक्त कोई नहीं मिल रहा था. मैं दिल्ली में रह चुका था, तो हर चीज को ऑनलाइन ऑर्डर या बुकिंग करने की आदत थी. बड़े शहरों में ‘अर्बन क्लैप’ जैसी होम सर्विस प्रोवाइड कराने वाली कंपनियां हैं, लेकिन छोटे शहरों में ऐसी कोई सर्विस आज भी नहीं है.

कारीगरों के साथ जाते थे साइट्स पर

हर्षवर्धन बताते हैं, ‘जब लोगों ने जुड़ने से इनकार कर दिया, तो मैं इन कारीगरों के साथ इनके साइट्स पर जाने लगा. वो किस तरह से काम करते हैं. किस काम का कितना चार्ज लेते हैं. इसे देखता था, इसे जानने में 6 महीने लग गए.

जब मैंने थोड़ा बहुत काम सीख लिया, तब नए-नए यंग वर्कर्स को कंपनी के साथ जोड़ना शुरू किया. जो लोग काम नहीं भी जानते थे, उन्हें भी अपनी कंपनी के साथ जोड़ा. दरअसल, यंग लोग ऑनलाइन मेथड को जानते हैं. इसलिए इनके साथ लाइन अप करने में मुझे आसानी हुई.

ऐसे करते है समस्या का समाधान

मान लीजिए आप भोपाल या जमशेदपुर के रहने वाले हैं. आपको इलेक्ट्रीशियन या कारपेंटर की जरूरत है, तो आप अपने प्रॉब्लम, उसकी डिटेल्स, सुविधा के मुताबिक टाइम, शेड्यूल, लोकेशन, इन सारी चीजों को भरते हैं. जैसे ही आप सब्मिट करेंगे, हमारे पास बुकिंग की डिटेल्स आ जाती है.

इसके बाद एरिया के मुताबिक हमारे वर्कर सर्विस के लिए जाते हैं. जब मैंने इस काम को शुरू किया था, तो घरवालों को नहीं बताया था. मम्मी-पापा कभी नहीं चाहते थे कि मैं इस तरह का बिजनेस करूं, जिसमें घर-घर जाकर मजदूर की ‘तरह काम करना पड़े. घर में बिजनेस का कोई कल्चर भी नहीं था. सभी लोग गवर्नमेंट जॉब में हैं.

घर वाले चाहते थे कि सरकारी नौकरी करूं

पापा चाहते थे कि मैं सरकारी नौकरी की तैयारी करूं, लेकिन मेरा मन इन सब चीजों में नहीं लगता था. कॉलेज टीचर कहते थे कि मेरा प्लेसमेंट भी नहीं होगा. कहीं दो-चार हजार रुपए की नौकरी भी लग जाए तो बड़ी बात होगी. दरअसल, मैं बैकबेंचर स्टूडेंट था. घर से कोई सपोर्ट करने वाला नहीं था. सभी लोग इसके खिलाफ थे. मैंने जो कुछ भी जॉब के दौरान कमाया था, और सेविंग की थी. सब इस मार्केट को समझने में ही खर्च हो गया.

हर्षवर्धन बताते हैं कि, जब उनके पास महज 350 रुपए बचे थे. मुझे आज भी याद है वो दिन 300 रुपए में मैंने पम्पलेट छपवाया था. आधी रात को गली- मोहल्ले, चौक-चौराहे, भीड़ भाड़ वाली जगहों पर जाकर खुद से पम्पलेट चिपकाता था.

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