जीवनसाथी की प्रतिष्ठा और करियर को नुकसान पहुंचाना, मानसिक क्रूरता के समान : SC

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने शुक्रवार को एक अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अगर कोई उच्च शिक्षित व्यक्ति अपने जीवनसाथी की प्रतिष्ठा और करियर को खराब करता है, या उसे अपूर्णनीय क्षति पहंचाता है तो ये मानसिक क्रूरता है।

कोर्ट ने पति के तलाक याचिका को स्वीकार किया

दरअसल, कोर्ट में तलाक से संबंधित एक मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस दिनेश महेश्वरी और जस्टिस ऋषिकेश राय की पीठ ने इस फैसले को सुनाया है। कोर्ट इस मामले में पति की तलाक याचिका को भी स्वीकार कर लिया है। साथ ही उत्तराखंड हाई कोर्ट के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया है जिसमें कहा गया था कि महिला द्वारा लगाया गया आरोप मध्यम वर्ग की शादीशुदा जिंदगी का हिस्सा है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी के ऐसे व्यवहार को मानसिक क्रूरता माना और पति को इस आधार पर तलाक पाने का अधिकारी बताया।

क्या था पूरा मामला

मामला एक सैन्य अधिकारी और उसकी पत्नी के बीच का है। जिमें पति एमटेक की डिग्री के साथ सैन्य आधिकारी था और पत्नी पीएचडी की डिग्री के साथ गवर्नमेंट कालेज में पढ़ाती थी। दोनों की शादी साल 2006 में हुई थी। कुछ महीने तक दोनों साथ में रहे फिर आपस में अनबन हो गई। शादी के करीब एक साल बाद ही दोनों अलग-अलग रहने लगे। अनबन के दौरान पत्नी ने पति के खिलाफ सेना के बड़े अधिकारियों से कई बार शिकायतें की। इस कारण से पति के खिलाफ सेना ने कोर्ट आफ इंक्वायरी की। इंक्वायरी की वजह से उसका करियर प्रभावित हुआ। इतना ही नहीं पत्नी ने इस दौरान कई अन्य अथॉरिटीज में भी पति के खिलाफ शिकायत की।

फैमिली कोर्ट ने भी पति के तलाक याचिका को स्वीकार किया था

साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी पति के खिलाफ आपमानजनक सामग्री पोस्ट की। इससे तंग आकर पति ने फैमिली कोर्ट में अर्जी देकर तलाक मांगा और कोर्ट से कहा कि उसकी पत्नी की इन हरकतों से उसके प्रतिष्ठा और करियर को नुकसान पहुंचा। पत्नी का यह व्यवहार मानसिक क्रूरता है इसलिए उसे तलाक दिया जाए। इसके बाद पत्नी ने भी फैमिली कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर कहा कि उसके दाम्पत्य संबंधों को पुनः स्थापित किया जाए। हालांकि कोर्ट ने सुबूतों को देखते हुए पति की तलाक अर्जी को मंजूरी दे दी।

कोर्ट ने कहा पति ने जिंदगी में बूरा असर झेला है

इस फैसले के बाद पत्नी उत्तराखंड हाई कोर्ट चली गई जहां फैमिली कोर्ट के फैसले को पलट दिया गया और HC ने कहा कि पत्नी ने जो किया वह मध्यम वर्ग की शादीशुदा जिंदगी का हिस्सा है। इसलिए पत्नी की दाम्पत्य संबंधों की प पुनस्र्थापना की मांग स्वीकार किया जाता है। हालांकि अब फिर से सुप्रीम कोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि जब पति ने पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों के कारण जिंदगी और करियर में बुरा असर झेला है तो पत्नी को उसके कानूनी नतीजे झेलने होंगे। वह सिर्फ इसलिए नहीं बच सकती कि किसी भी अदालत ने आरोपों को झूठा नहीं ठहराया है।

SC ने कहा पत्नी ने जो किया वो कही से भी न्यायोचित नहीं है

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हाई कोर्ट ने इस मामले को जिस नजरिए से देखा है वो सही नहीं है। कोर्ट को ये देखना चाहिए था कि इस मामले में एक बहुत ही शिक्षित महिला ने अपने जीवनसाथी पर आरोप लगाए थे। इससे उसके करियर और प्रतिष्ठा को क्षति पहुंची है। साथ ही समाज में भी उसकी प्रतिष्ठा खराब हुई है। ऐसे में उस व्यक्ति से अपनी पत्नी को माफ करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। साथ ही कोर्ट ने ये भी कहा कि पत्नी द्वारा यह कहना कि उसने ये सब शिकायतें बस अपनी वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए की थी ये कही से भी न्यायोचित नहीं है।

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