Rahul Jyotiraditya Friendship : राहुल-सिंधिया थे परममित्र, लेकिन इसलिए टूटी दोनों की दोस्ती!

Rahul Jyotiraditya Friendship : राहुल-सिंधिया थे परममित्र, लेकिन इसलिए टूटी दोनों की दोस्ती!

Rahul Jyotiraditya Friendship : गांधी परिवार के युवराज राहुल और शाही परिवार के महाराज सिंधिया की दोस्ती (Rahul Jyotiraditya Friendship) कितनी पक्की थी, यह तो आप सभी भलीभांती जानते ही होंगे। सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने से पहले दोनों के बीच काफी गहरी दोस्ती (Rahul Jyotiraditya Friendship) थी। दोनों के बीच दोस्ती इतनी गहरी थी कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली हार के बाद कांग्रेस के कई बड़े दिग्गज नेता राहुल गांधी के खिलाफ हो गए लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया उनके साथ एक सिपाही की तरह खड़े रहे। उन्होंने राहुल गांधी का उस दौरान साथ नहीं छोड़ा। राहुल ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया लेकिन इसके बाद भी महाराज चट्टान की तरह खड़े रहे। लेकिन सिंधिया के बीजेपी में जाने के बाद सवाल खड़े होते आए है कि आखिर क्या बात थी की कृष्ण सुदामा की जोड़ी (Rahul Jyotiraditya Friendship) को किसकी नजर लगी, दोनों केी बीच दोस्ती के रिश्ते क्यों टूटे।

राहुल-सिंधिया के पिता रहे गहरे दोस्त 

राहुल और सिंधिया के बीच की दोस्ती (Rahul Jyotiraditya Friendship) उनके पिताओं की दोस्ती से थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराज सिंधिया और राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी के बीच बच्छी दोस्ती थी। बताया जाता है कि दोनों के बीच ऐसी दोस्ती थी कि एक बार इंदिरा गांधी ने राजीव गांधी को साफ तौर पर कह दिया था कि वह माधवराज सिंधिया को कैबिनेट में शामिल नहीं करें। यह बात इंदिरा गांधी ने अपनी मौत होने के कुद दिनों पहले ही कही थी। उन्होंने राजीव गांधी से कहा था की तुम जब भी कभी प्रधानमंत्री बनो तो माधवराज सिंधिया को कभी कैबिनेट में नहीं लेना। लेकिन दोनों के बीच की दोस्ती इतनी गहरी थी की उन्होंने अपनी मां की बात नहीं मानी थी।

दादियों में था छत्तीस का आंकड़ा!

वही दोनों की दादियों के बीच छत्तीस का आंकड़ा चलता था। देश को आजादी मिलने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और सिंधिया परिवार एक-दूसरे को तीरछी निगाहों से देखने लगे थे। माधवराव की मां विजयाराजे सिंधिया की राजनीति में एंट्री नेहरू के कहने पर ही हुई थी, लेकिन राजमाता को राजनीति में आने का फैसला मजबूरी में लेना पड़ा था। कांग्रेस में आने के कुछ सालों बाद राजमाता कांग्रेस छोड़कर जनसंघ में चली थी। जब साल 1977 में इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई तो राजमाता को भी गिरफ्तार किया गया था। राजमाता को अपराधियों की तरह तिहाड़ जेल में रखा गया। वही केंन्द्र के इशरों पर जांच एजेंसियों ने सिंधिया परिवार के महल पर छापा मारा। सिंधिया राजघराने पर सोने की तस्करी का आरोप तक लगा था। इसी बाद से इंदिरा गांधी और राजमाता के बीच छत्तीस का आंकड़ा हो गया था।

स्कूल की दोस्ती थी राहुल और ज्योतिरादित्य की

राहुल और ज्योतिरादित्य की दोस्ती (Rahul Jyotiraditya Friendship) दून स्कूल से शुरू हुई थी, जहां दोनों पढ़ने के लिए गए थे। बाद में दोनों राजनीति में आए, तब भी यह सिलसिला जारी रहा। राहुल जब कांग्रेस के अध्यक्ष बने तब ज्योतिरादित्य उनकी कोर टीम में शामिल थे। कहा जाता है कि प्रियंका गांधी, राहुल की तरह ज्योतिरादित्य (Rahul Jyotiraditya Friendship) को भी अपने भाई जैसा मानती थीं। कई बार जब ज्योतिरादित्य किसी मुद्दे पर राहुल से सहमत नहीं होते तब प्रियंका बड़ी बहन की भूमिका में आ जातीं और दोनों की सहमति बनाने का रास्ता तैयार करती थीं। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के ठीक बाद राहुल गांधी ने पार्टी में पुराने नेताओं की जगह नए चेहरों को आगे लाने का खाका तैयार किया था। ज्योतिरादित्य इस टीम के सबसे बड़े चेहरे थे। 2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जीत मिली तो चुनाव में ज्योतिरादित्य हर कदम पर राहुल के साथ थे। लेकिन राहुल चाहकर भी सिंधिया (Rahul Jyotiraditya Friendship) को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बना सके।

दोनों की दोस्ती टूटने का सबसे बड़ा कारण

सिंधिया को मुख्यमंत्री नहीं बनाना शायद यही दोनों परिवारों के बीच और दोनों की दोस्ती (Rahul Jyotiraditya Friendship) टूटने का सबसे बड़ा कारण बना। जब कमलनाथ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो शुरुआत में सिंधिया और कमलनाथ के संबंध काफी अच्छे थे। लेकिन जैसे-जैसे सरकार में दिग्विजय सिंह दखल बढ़ता गया, वैसे ही सिंधिया के लिए मुश्किलें खड़ी होती गई। सिंधिया ने दिग्गी की दखलअंदाजी को लेकर गांधी परिवार तक बात की लेकिन उन्हें मिला तो केवल आश्वासन। जब सिंधिया को लगा कि राहुल या तो जानबूझकर उनकी बातों की अनदेखी कर रहे या वे चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे। लेकिन जब राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारी का समय आया और दिग्विजय सिंह ने सिंधिया के रास्ते से हटाने का प्रयास किया। वही सिंधिया भी राहुल के पास पहुंचे, लेकिन राहुल और कांग्रेस पार्टी ने कुछ नहीं किया जिससे सिंधिया पार्टी और गांधी परिवार से नाराज होते चले गए। इसके बाद ही उन्होंने कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया। और उन्होंने अपने विधायकों को बीजेपी में लाकर कांग्रेस सरकार गिरा दी।

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