Virtual Autism Risk: क्या आपका बच्चा भी वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार, इन तरीकों से करें बचाव

वर्चुअल ऑटिज्म उस स्थिति को कहते है जहां पर बच्चा खेलने या दूसरे बच्चों से बातचीत करने की बजाय मोबाइल और स्मार्टफोन, टीवी या कंप्यूटर पर ज्यादातर वक्त बिताता है।

Virtual Autism Risk: क्या आपका बच्चा भी वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार, इन तरीकों से करें बचाव
Virtual Autism: पहले बच्चे जहां पर खेलों और किताबों में खुद को खुश रखते थे वहीं पर आज कल छोटे से लेकर बड़े बच्चों के हाथों में मोबाइल नजर आता है। यहां पर बच्चों की  जिद को पूरा करते हुए पैरेंट्स बच्चों के हाथों में मोबाइल थमा देते है। इस वजह से कई बच्चे बिना मोबाइल के रह भी नहीं पाते और हर वक्त मोबाइल थामे चलते रहते है। वर्चुअल ऑटिज्म के मामले कई बच्चों में सामने आ चुके है आइए जाते है विस्तार से इसे-

क्या होता है आखिर वर्चुअल ऑटिज्म

यहां पर वर्चुअल ऑटिज्म उस स्थिति को कहते है जहां पर बच्चा खेलने या दूसरे बच्चों से बातचीत करने की बजाय मोबाइल और स्मार्टफोन, टीवी या कंप्यूटर पर ज्यादातर वक्त बिताता है। यहां पर यह स्थिति 10-12 साल के बच्चों में ही नहीं पांच साल के बच्चों तक में भी शुरू हो गई है। वर्चुअल ऑटिज्म में बच्चे ज्यादातर वक्त मोबाइल या टीवी के सामने बिताते हैं तो वो बोलने, बात करने या बात को समझने में दिक्कत महसूस करने लगते हैं।

बच्चे किसी भी खेल गतिविधि या पढ़ाई को लेकर एक्टिवेट करने की बजाय सारा दिन टीवी या मोबाइल के आगे बैठता है तो उसका दिमाग उसी तरह व्यवहार करने लगता है। इस स्थिति में बच्चा अपना आत्मविश्वास खोते हुए बाकी बच्चों से आंखे मिलाने से भी कतराता है। इसे वर्चुअल ऑटिज्म की गंभीर स्थिति कहा जाता है।

बच्चे को शेड्यूल के मुताबिक बनाएं एक्टिव

यहां पर आपका बच्चा यदि वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार हो गया है तो आपको उसे इस स्थिति से निकालना जरूरी है यहां पर डांट-डपटकर बच्चों को चपेट से बाहर निकालने की बजाय आप शेड्यूल बनाकर धीरे-धीरे बाहर निकालने का प्रयास करें।
1- यहां पर आप बच्चों को फिजिकल एक्टिविटी, खेल और दूसरी एक्टिविटीज में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें, लोगों से बच्चा घुलेगा मिलेगा और कई सारे दोस्त बनने से रूचि बढे़गी।
2- यहां पर बच्चों को मोबाइल से दूर रखने के लिए ऐसा शेड्यूल सेट करें कि वह पूरा दिन बिजी रहे, दोपहर तक बच्चा स्कूल से आने के बाद लंच और आराम करे. इसके बाद उसकी आउटडोर एक्टिविटीज पर फोकस करें।
3- बच्चे के सोने के शेड्यूल को भी सेट करना जरूरी है इसके लिए सही समय पर सोएं और मोबाइल देखने में समय खराब ना करे।
4-  बच्चे के साथ आप पेरेंट्स भी स्पोर्ट्स और फन एक्टिविटी में भाग ले ताकि बच्चे को मजा आए और मोबाइल की बिल्कुल याद नहीं आएं।
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