पूर्व के विचारों का यह मतलब नहीं है कि समिति में नियुक्त नहीं किया जा सकता : उच्चतम न्यायालय

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नयी दिल्ली, 19 जनवरी (भाषा) पहले के व्यक्त किए गए विचार का यह मतलब नहीं है कि किसी व्यक्ति को उस मुद्दे से जुड़ी समिति में नियुक्त नहीं किया जा सकता है, क्योंकि विचार बदल भी सकते हैं। यह टिप्पणी मंगलवार को उच्चतम न्यायालय ने की।

उच्चतम न्यायालय की इस टिप्पणी का इसलिए महत्व है कि नए कृषि कानूनों पर किसानों और केंद्र के बीच जारी गतिरोध का समाधान करने के लिए हाल में गठित समिति के कुछ सदस्य पहले इस विषय पर अपने विचार व्यक्त कर चुके थे।

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष और समिति के सदस्य भूपेन्द्र सिंह मान ने पिछले हफ्ते कहा था कि वह चार सदस्यीय समिति से खुद को अलग कर रहे हैं।

बहरहाल एक अन्य मामले की सुनवाई कर रही प्रधान न्यायाधीश एस. ए. बोबडे की पीठ ने कहा, ‘‘एक समिति गठित की गई है और अगर व्यक्ति ने मुद्दे पर पहले अपने विचार व्यक्त किए हैं तो इसका यह मतलब नहीं है कि वह व्यक्ति समिति में नहीं रह सकता है।’’

पीठ ने कहा, ‘‘समिति गठित करने के बारे में समझ की अजीब कमी है।’’ पीठ में न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति विनीत शरण भी थे, जो आपराधिक मामलों की सुनवाई में खामियों से जुड़ी याचिका पर गौर कर रहे थे।

पीठ ने कहा कि समिति का सदस्य बनने से पहले किसी व्यक्ति का किसी मुद्दे पर कुछ विचार हो सकता है लेकिन विचार बदल सकते हैं।

उच्चतम न्यायालय ने 12 जनवरी को एक अंतरिम आदेश में नए कृषि कानूनों के कार्यान्वयन पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी और शिकायतों पर सुनवाई करने तथा गतिरोध समाप्त करने के लिए अनुशंसा करने की खातिर चार सदस्यीय एक समिति का गठन किया था।

तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश सहित देश के अलग-अलग हिस्से के किसान दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर एक महीने से अधिक समय से प्रदर्शन कर रहे हैं।

भाषा नीरज नीरज माधव

माधव

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