Presidential train: राष्ट्रपति कोविंद जिस ट्रेन से लखनऊ पहुंचे हैं, उसकी खासियत आपको जरूर जाननी चाहिए!

Presidential train: राष्ट्रपति कोविंद जिस ट्रेन से लखनऊ पहुंचे हैं, उसकी खासियत आपको जरूर जाननी चाहिए!Presidential train: You must know the specialty of the train by which President Kovind has reached Lucknow! nkp

Presidential train: राष्ट्रपति कोविंद जिस ट्रेन से लखनऊ पहुंचे हैं, उसकी खासियत आपको जरूर जाननी चाहिए!

नई दिल्ली। सोमवार को दो दिन के लखनऊ दौरे पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद प्रेसिडेंशियल ट्रेन से लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पहुंचे। जहां राज्यपाल आनंदीबेन पटेल व मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनका स्वागत किया। स्वागत के बाद राष्ट्रपति राजभवन के लिए रवाना हो गए। वहीं लोग इस दौरे से ज्यादा राष्ट्रपति की ट्रेन के बारे में जानना चाहते हैं। ऐसे में आज हम जानेंगे कि प्रेसिडेंशियल ट्रेन की खासियत क्या है?

खासियतों से भरी हुई है ट्रेन

राष्ट्रपति जिस प्रेसिडेंशियल ट्रेन से लखनऊ पहुंचे हैं, वह खासियतों से भरी हुई है। इस ट्रेन का इतिहास काफी रोचक है। साथ ही यह अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है। ट्रेन कड़ी सुरक्षा में रहती है। आम लोग इस ट्रेन को देख भी नहीं सकते। रेलवे अधिकारी इस कोच को प्रेसिडेंशियल सलून भी कहते हैं। इसे ट्रेन की श्रेणी में नहीं रखा जाता। इस सलून में केवल दो कोच होते हैं। जिसका नंबर 9000 और 9001 होता है।

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अब तक 87 बार इस सैलून का किया गया है इस्तेमाल

अब तक देश के अलग-अलग राष्ट्रपति 87 बार इस सैलून का प्रयोग कर चुके हैं। सबसे पहले 1950 में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने दिल्ली से कुरूक्षेत्र तक का सफर प्रेसिडेंशियल ट्रेन से किया था। हालांकि इसका नियमित रूप से इस्तेमाल 1960-1970 के बीच हुआ। इसके बाद करीब 26 साल बाद वर्ष 2003 में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इससे बिहार की यात्रा की थी और अब 18 साल बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद इस ट्रेन से सफर कर रहे हैं।

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ट्रेन में ये हैं सुविधाएं

ट्रेन में कई सुविधाएं हैं। जैसे- बुलेट प्रूफ विंडो, जीपीआरएस सिस्टम, पब्लिक एड्रेस सिस्टम, सैटेलाइट आधारित कम्युनिकेशन सिस्टम, डाइनिंग रूम, विजिटिंग रूम, लाउंज, कॉन्फ्रेंस रूम आदि

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क्या है ट्रेन का इतिहास?

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रेसिडेंशियल ट्रेन का प्रयोग 19वीं शताब्दी में किया जाता था। सबसे पहले क्वीन विक्टोरिया ने इसका प्रयोग किया था। जिसके बाद यह चलन में आ गया था। इसके बाद 1927 में इसे कलकत्ता में सुरक्षित रख दिया गया। उस समय इसे वाइस रीगल कोच के नाम से भी जाना जाता था। पहले भी इस सलून में एशो-आराम की सारी सुविधाएं मौजूद थी। तब पर्शिया की कालीनों से लेकर सिंकिंग सोपे तक मौजूद रहते थे। हालांकि तब एसी की सुविधा नहीं होती थी, इसलिए कोच में एयर कूलिंग के लिए खस मैट का इस्तेमाल किया जाता था।

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