भक्त ने प्रेमानंद महाराज से पूछा कि जब बेटे ने अपनी माँ से कहा— “जीवनभर आपने प्रपंच किया… अब ज्ञान दे रही हो?” तो ऐसे में माँ क्या जवाब दे? महाराज ने बड़ी शांत आवाज़ में कहा— “माँ तो जीवनभर बस देती ही रही… त्याग, धैर्य और प्रेम। जिसे तुम प्रपंच समझ रहे हो, वही तुम्हें इस लायक बनाता है कि आज सवाल पूछ सको। माँ का जीवन ज्ञान नहीं… तपस्या है, जिसे समझने के लिए हृदय चाहिए, बुद्धि नहीं।”
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