पातालपानी: बिना सलामी दिए यहां से नहीं गुजरती कोई ट्रेन, नहीं तो आगे जाकर हो जाती है दुर्घटनाग्रस्त!

Patalpani

भोपाल। कहते हैं भारतीय रेलवे देश की जीवन रेखा है। इसके कंधों पर अपने नागरिकों की जिंदगी है, ये सच है। हमने पिछले लॉकडाउन में भारतीय रेलवे के बंद होने से पैदा हुई भयावहता को देखा है। भारत में रेल से यात्रा करना एक खट्टे-मिट्ठे अनुभव के समान होता है। भारतीय रेल और उससे जुडी कई रहस्मय बातें लोगों के लिए चर्चा का विषय बन जाती हैं। भारत में ऐसे कई रेलवे स्पॉट हैं जो आज भी विज्ञान के इस युग में रहस्यमयी बने हुए हैं। कई बार इन जगहों पर काम करते हुए रेल कर्मचारियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा। रेलवे के इन कर्मचारियों द्वारा शिकायत के बाद रेलवे ने कई जगह दैवीय स्थान और मजार भी बनाए हैं। साथ ही इन जगहों पर थोड़ी देर के लिए ट्रेन भी रोक दी जाती है।

मप्र का पातालपानी

वैसे तो देश में कई ऐसे रेलवे स्टेशन हैं जिसे लोग भूतिया मानते हैं। लेकिन आज हम बात करने वाले हैं मप्र के पातालपानी (Patalpani) के बारे में, जहां आज भी अंग्रेजों से लड़ने वाले टंट्या भील (Tantia Bhil) के मंदिर को सलामी देने के लिए ट्रेन दो मिनट के लिए रोक दी जाती है। कहा जाता है कि इसके बाद ही ट्रेन में सवार यात्री सही सलामत अपने गंतव्य तक पहुंच पाते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि यदि यहां पर ट्रेन रुककर सलामी न दे तो वह दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है या खाई में गिर जाती है। ऐसा भी कहा जाता है कि यदि कोई चालक गलती से सलामी देना भूल जाता है तो ट्रेन यहां से आगे नहीं बढ़ती है। इसलिए भारतीय रेलवे ने यहां खुद से एक अघोषित नियम बना लिया है। रेल ड्राइवर यहां पहुंचने पर कुछ देर के लिए ट्रेन रोक देते हैं और सलामी के लिए हार्न बजाकर ही गाड़ी आगे बढ़ाते हैं।

यहां टंट्या मामा भील का मंदिर है

मालूम हो कि यहां पर एक मंदिर है जो कभी अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले मध्यप्रदेश के टंट्या मामा भील का है। अंग्रजों ने इन्हें फांसी देने के बाद उनके शव को पतालपानी के जंगलों में कालाकुंड रेलवे ट्रैक के पास दफना दिया था। स्थानीय लोगों का मानना है कि टंट्या मामा का शरीर जरूर खत्म हो गया था, लेकिन उनकी आत्मा अभी भी इन जंगलों में रहती है। लोग बताते हैं कि उनके शव को यहां फेंके जाने के बाद लगातार रेल हादसे होने लगे थे। ऐसे में स्थानिय लोगों ने टंट्या मामा का मंदिर बनवाने का फैसला किया। जिसके बाद आज भी यहां मंदिर के सामने प्रत्येक रेल रूकती है और उन्हें सलामी दी जाती है।

रेलवे अधिकारी कुछ और कहते हैं

हालांकि रेलवे अधिकारी इस कहानी को गलत बताते हैं, उनका कहना है कि यहां से कालाकुंड तक रेल ट्रैक काफी खतरनाक है, इसलिए पातालपानी में ट्रेनों को रोककर ब्रेक चेक किया जाता है। चूंकि यहां मंदिर भी बना हुआ है, इसलिए चालक यहां से सिर झुकाकर अपनी आस्था के अनुसार आगे बढ़ते हैं। वहीं स्थानीय लोग बताते हैं कि जब-जब ट्रेन यहां नहीं रोकी गई, तब-तब यहां रेल एक्सीडेंट हुए हैं। इसलिए कोई भी ट्रेन यहां से गुजरने से पहले टंट्या मामा को सलामी जरूर देती है।

कौन थे टंट्या मामा भील

इतिहासकारों की मानें तो खंडवा जिले की पंधाना तहसील के बडदा में सन् 1842 के करीब भाऊसिंह के यहां टंट्या का जन्म हुआ। पिता ने टंट्या को लाठी-गोफन व तीर-कमान चलाने का प्रशिक्षण दिया। टंट्या ने धर्नुविद्या में दक्षता हासिल करने के साथ ही लाठी चलाने और गोफन कला में भी महारत प्राप्त कर ली। युवावस्था में ही अंग्रेजों के सहयोगी साहूकारों की प्रताडऩा से तंग आकर वह अपने साथियों के साथ जंगल में कूद गए और विद्रोह करने लगे।

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