कृषि कानूनों में हमारी मांगें शामिल हैं, इनमें सुधार के प्रयास करेंगे: शेतकारी संगठन प्रमुख

मुंबई, 12 जनवरी (भाषा) आंदोलनकारी किसानों के साथ वार्ता के लिये उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति के सदस्य नियुक्त किये गए शेतकारी संगठन के प्रमुख अनिल घनवत ने मंगलवार को कहा कि नए कृषि कानूनों में उन मांगों को आंशिक रूप से कार्यान्वित किया गया है, जिनकी गुहार उनका संगठन दशकों से लगा रहा था।

उन्होंने ठेके पर आधारित खेती समेत सुधारों का समर्थन करते हुए कहा कि वह इन कानूनों में सुधार के प्रयास करेंगे।

घनवत ने कहा, ”हम केन्द्र के इन तीन कृषि कानूनों की सराहना नहीं कर रहे हैं, जिन्हें किसानों को आजादी देने वाला बताया गया है। दिवंगत शरद जोशी के नेतृत्व में शेतकारी संगठन ने ही सबसे पहले इन सुधारों के लिये दबाव बनाया था।”

घनवत के संगठन पर किसानों का प्रतिनिधित्व करने के बाजवूद इस मुद्दे पर केन्द्र सरकार का समर्थन करने के आरोप लग रहे हैं।

उन्होंने कहा, ”मौजूदा सरकार ने कुछ हद तक इन्हें लागू करने की कोशिश की है। समिति में मेरी भूमिका किसानों के हितों की रक्षा करने और इन कानूनों में सुधार लाने की होगी।”

विश्व बैंक में काम करने वाले अर्थशास्त्री शरद जोशी ने 1970 के अंत में शेतकारी संगठन की स्थापना की थी। वह अन्य चीजों के अलावा यह चाहते थे कि किसानों को उत्पाद बेचने और निर्यात करने पर लगी पाबंदियों से आजादी मिले।

घनवत ने कहा, ”हमारे 40 साल के अथक संघर्ष के बाद कुछ हद तक मांगों को मान लिया गया है। हम पहले भी और अब भी इस बात पर कायम रहे हैं कि किसानों को अपनी उपज बेचने की आजादी और तकनीक तक पहुंच मिलनी चाहिये। ”

उन्होंने कहा, ”हम (कृषि उपज विपण समितियों से) सरकार द्वारा उपकर वसूले जाने के पूरी तरह खिलाफ हैं। केन्द्र ने उपकर को खत्म कर दिया था, लेकिन बाहरी दबाव के चलते, बाद में इसे कानूनों में जोड़ा गया। ”

घनवत ने कहा कि समिति उपकर पर आपत्तियों को नोट करेगी क्योंकि यह हमेशा किसानों पर लगाया जाता है और व्यापारियों को इसे देना पड़ता है।

उन्होंने कहा, ”उच्चतम न्यायालय ने हमें जिम्मेदारी दी है और हम मौजूदा कानूनों का विरोध कर रहे किसान नेताओं से वार्ता करेंगे। हम उनका पक्ष सुनकर समाधान निकालने का प्रयास करेंगे।”

घनवत से जब किसानों की इस चिंता के बारे में पूछा गया कि ठेके पर खेतीबाड़ी से वे अपनी जमीन खो देंगे तो उन्होंने कहा, ”स्थानीय स्तर पर पहले से ही ठेके पर खेती की जा रही है। इसके अलावा खरीदार कंपनी उपज में दिलचस्पी रखती है, खेती में नहीं। मेरे सामने ऐसे कोई मामला नहीं आया जिसमें कॉरपोरेट घरानों ने जमीन हथिया ली हो।”

घनवत ने कहा कि उच्चतम न्यायालय किसानों की आत्महत्या को लेकर समय-समय पर सरकार को फटकार लगाता रहा है और इन आत्महत्याओं को रोकने के लिये सुधार आवश्यक हैं।

भाषा जोहेब मनीषा माधव

माधव

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