आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होते दो फैसले: मेरा स्पष्टीकरण

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण को लेकर हाल ही में 2 महत्वपूर्ण फैसले सुनाए। दोनों फैसले प्रथम दृष्टया विरोधाभासी प्रतीत होते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। मध्यप्रदेश मंत्रालय सेवा अधिकारी कर्मचारी संघ के अध्यक्ष इंजीनियर सुधीर नायक ने स्पष्टीकरण दिया है।

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पिछले दिनों समाचार पत्रों में दो समाचार प्रकाशित हुए

1. आरक्षित वर्ग वाले जनरल के बराबर नंबर लाते हैं तो जनरल सीट पर भी आ सकेंगे। 

2. आरक्षण का लाभ लिया है तो जनरल के बराबर नंबर लाने पर भी जनरल सीट पर नहीं आ सकते। 

दोनों फैसले माननीय सर्वोच्च न्यायालय के हैं और बहुत कम अंतराल में ही सुनाए गए हैं। एक निर्णय दिसंबर 2025 का है और दूसरा अभी जनवरी 2026 का।

इन दोनों फैसलों के आधार पर सोशल मीडिया में तरह तरह के मैसेज चल रहे हैं और लोग इन्हें अपने अपने पक्ष में प्रचारित कर रहे हैं। बीच में कुछ लोग हैं जो कन्फ्यूजन में हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि दोनों में से कौन सा सही है। दोनों फैसले प्रथम दृष्टया विरोधाभासी प्रतीत होते हैं। प्रथम निर्णय राजस्थान के एक मामले का है और दूसरा कर्नाटक के मामले का।

पहले समाचार पत्र बहुत विशेषज्ञतापूर्ण खबरें छापते थे। संबंधित विषय के विशेषज्ञों की राय शामिल की जाती थी। समाचार पत्रों को पढ़-पढ़कर लोग यूपीएससी पीएसी जैसी परीक्षाओं की तैयारी करते थे। अखबार में छपा हुआ प्रामाणिक होता था। अब इतनी कॉम्पिटीशन है और इतनी जल्दबाजी है कि जो भी आया उसे हूबहू छापकर फुर्सत हो जाते हैं।

खैर, मैं विधि विशेषज्ञ तो नहीं हूं। मैंने होना भी नहीं चाहा। मनुष्य के बनाए नियमों में मेरी रुचि नहीं रही। मैं ब्रह्मांड के नियमों को जानने की फिराक में रहा। तो कुल मिलाकर मैंने दोनों फैसलों को मूलतः पढ़ा। मेरे परम मित्र राजेश नेमा जी ने दोनों फैसले उपलब्ध कराए और नेमा जी न्यायालीन फैसलों के जानकार हैं इसलिए उन्होंने मुझे परामर्श भी दिया।

दोनों फैसलों में विरोधाभास नहीं

सूक्ष्मता से देखें तो दोनों फैसलों में विरोधाभास नहीं है। इसको इस तरह समझिए। एक व्यक्ति आरक्षित वर्ग का है। उसने किसी परीक्षा में आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार के रूप में आवेदन किया। भले ही वह उम्मीदवार आरक्षित वर्ग का था, लेकिन उसे परीक्षा के किसी भी चरण आयु सीमा, शैक्षणिक योग्यता, प्रारंभिक परीक्षा इत्यादि में आरक्षण का लाभ लेने की कोई जरूरत नहीं पड़ी और परीक्षा में भी उसके अंक सामान्य उम्मीदवारों के बराबर ही आए। ऐसी स्थिति में उसे जनरल कैटेगरी की सीट मिल जाएगी क्योंकि आरक्षित श्रेणी से आवेदन करने के बावजूद उसे किसी भी स्टेज पर आरक्षण का लाभ लेने की जरूरत नहीं पड़ी।

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सुप्रीम कोर्ट

दूसरा उदाहरण

अब दूसरा उदाहरण देखिए। एक व्यक्ति ने आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार के रूप में आवेदन किया। परीक्षा के किसी चरण जैसे आयु सीमा शैक्षणिक योग्यता प्रारंभिक परीक्षा इत्यादि में उसे आरक्षण का लाभ भी मिला, लेकिन बाद में फाइनल परीक्षा में उसके नंबर जनरल कैटेगरी के नंबर के बराबर आ गए। ऐसी स्थिति में कोर्ट का कहना है कि फाइनल परीक्षा में भले ही उसके नंबर जनरल कैटेगरी वालों के बराबर आए हैं, लेकिन उसके पहले उसने किसी स्टेज पर आरक्षण का लाभ लिया है इसलिए उसे जनरल के समतुल्य नहीं माना जाएगा।

कोर्ट का यह मत है कि कोई भी परीक्षा एक लंबी प्रक्रिया होती है और यह प्रक्रिया आवेदन पत्र प्रस्तुत करने से शुरू होकर फाइनल परीक्षा या इंटरव्यू पर जाकर समाप्त होती है। इस पूरी प्रक्रिया में अनेक चरण होते हैं। आवेदन पत्र, आयुसीमा शैक्षणिक योग्यता की जांच, प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा, साक्षात्कार इत्यादि। कुछ परीक्षाओं में फिजिकल फिटनेस, मेंटल फिटनेस इत्यादि का भी टेस्ट होता है। इनमें से किसी भी एक चरण में भी आरक्षण का लाभ लिया गया है तो उस उम्मीदवार को आरक्षित श्रेणी में ही माना जाएगा भले ही अंतिम परीक्षा में उसके नंबर जनरल के बराबर या उससे अधिक भी आ गए हो। यदि किसी भी चरण में आरक्षण का लाभ नहीं लिया है तो केवल इस आधार पर कि उसने अपने आवेदन पत्र में आरक्षित श्रेणी लिखा था, उसे जनरल कैटेगरी में जाने से वंचित नहीं किया जाएगा।

आरक्षित श्रेणी में आवेदन करने से कोई आरक्षित वर्ग का नहीं माना जाएगा

मतलब यह समझ में आता है कि आरक्षित श्रेणी में आवेदन पत्र प्रस्तुत करने मात्र से ही कोई व्यक्ति आरक्षित वर्ग का नहीं माना जाएगा। उसने किसी बिंदु पर आरक्षण का लाभ लिया भी या नहीं यह भी देखना होगा। जहां तक मुझे याद आता है टीना डाबी वाले मामले में भी यही निर्णय आया था। टीना डाबी ने IAS की परीक्षा में सभी श्रेणियों में टॉप किया था, लेकिन चूंकि प्रिलिमिनरी उन्होंने आरक्षित उम्मीदवार के रूप में निकाली थी इसलिए उन्हें ओवर ऑल आरक्षित श्रेणी में ही माना गया था।
इस तरह दोनों फैसले विरोधाभासी नहीं हैं बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि कोई विधि विशेषज्ञ मेरी इस पोस्ट पर और कुछ जानकारी देने की कृपा करेंगे तो उनका स्वागत है।

लेकिन इन दोनों फैसलों से एक नया प्रश्न उभरता है। ये दोनों ही फैसले प्रथम नियुक्ति या सीधी भर्ती से संबंधित हैं। जब कोर्ट यह कह रहा है कि किसी भी स्टेज पर आरक्षण का लाभ लेने वाले को जनरल सीट पर जाने का हक नहीं है तो पदोन्नति के मामले में भी यह सिद्धांत लागू होना चाहिए। आरक्षण का लाभ लेकर आए हुए किसी व्यक्ति को पदोन्नति में जनरल की सीट क्यों दे दी जाती है ?

मेरे ख्याल से इस एंगल से कोई याचिका माननीय न्यायालय में लगाने की कोई बात अभी तक सुनने में नहीं आई।

( लेखक मध्यप्रदेश मंत्रालय सेवा अधिकारी कर्मचारी संघ के अध्यक्ष हैं )

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