Basant Panchami 2026: केया अक्सर लोगों से सुनती 'बिटिया मम्मा का गोरा रंग लेती तो अच्छा होता', फिर बसंत पंचमी पर ऐसा क्या हुआ कि सब बदल गया

हर साल की तरह दोनों भाई-बहन ने सरस्वती जी की पूजा की। लेकिन घर का माहौल बोझिल हो गया था। घरेलू सहायक सगुना आलूबड़े और सैंडविच के नाश्ते की तैयारी कर रही थी। सब पूजा के बाद खाने जा ही रहे थे कि घर के सामने कार रुकी। फिर क्या हुआ ?

Basant Panchami Kahani Barkha Shukla Keya Ka Basant Hindi

केशव मिश्रा और यामिनी मिश्रा ने अपनी बिटिया का नाम दोनों के नाम के पहले अक्षर से मिलाकर केया रखा था। केया से छोटा बेटा मेहुल। केशव सरकारी बैंक में ऑफिसर है। केया मैनिट भोपाल से बी.टेक. करने के बाद बेंगलुरु में मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पैकेज में जॉब कर रही है। बेटा मेहुल लॉ कर रहा है। जहाँ केया ने अपनी मम्मा के सुंदर नैन-नक्श लेकर पापा का सांवला रंग लिया है, तो बेटे मेहुल ने मम्मा का गोरा रंग लिया है, लेकिन दिखता अपने पापा की तरह है। थोड़े बड़े होने से ही केया अक्सर लोगों से सुनती 'बिटिया मम्मा का गोरा रंग लेती तो अच्छा होता, लड़कों का रंग कौन देखता है।' लेकिन मम्मा, पापा ने अपनी बेटी के अंदर इस तरह की कोई भावना को जन्म न लेने दिया। कॉन्वेंट स्कूल में पढ़े दोनों भाई-बहन आत्मविश्वास से भरपूर हैं। 

केया के दादा जी बचपन में ही नहीं रहे थे, केशव अकेले बेटे हैं, उनसे बड़ी एक बहन है। दादी इन्हीं लोगों के साथ रहती है, या यूं कह लें ये लोग दादी के साथ रहते हैं। दादी के सानिध्य में मम्मा सारे त्योहार बड़े रीति-रिवाज से मनाती है। केया को भी सारे त्योहार बहुत अच्छे लगते। इन सब में उसे बसंत पंचमी मनाना बहुत भाता। उस दिन मम्मा पीली साड़ी पहन तुलसी को सुहाग सामग्री भेंट कर सुहाग लेती। गोबर की गौर बना उसे सालभर पूजा के लिए रखती। केसरिया भात बना उसका भोग लगाती। दोनों भाई-बहन से सरस्वती जी की पूजा करवाती। दादी भी अपना पीला शॉल ओढ़कर बैठ जाती। मम्मा खुद के साथ पापा, उसे व मेहुल को भी पीले कपड़े पहनवाती।

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आजकल केशव प्रमोशन पाकर असिस्टेंट रीजनल मैनेजर बन भोपाल आ गए हैं। इस बार केया भी न्यू ईयर पर आई है तो वर्क फ्रॉम होम लेकर रुकी हुई है। बुआ भी संक्रांति पर आ गई है। और अब केया का पसंदीदा त्योहार बसंत पंचमी भी आने वाला है, ये इस साल संडे को पड़ा तो सब लोग घर पर ही है। मम्मा पूजा की तैयारी कर रही थी। घर केसरिया भात की खुशबू से महक रहा था। केया ने मम्मा की शिफॉन की पीली साड़ी पहन ली थी, प्लेन साड़ी पर गोल्डन बूटे बने थे, पतली सी गोल्डन बॉर्डर थी। गोल्डन ब्लाउज के साथ साड़ी के साथ केया भी जँच रही थी।

मम्मा की तो अपनी लाड़ली को देख आँखें जुड़ गई। तभी बुआ बोल पड़ी 'क्या केया काले पर पीला' और व्यंग्य से हँस दी।

दादी तुरंत बोली 'अब ऐसा भी काला रंग नहीं है बिटिया का, फालतू बात न किया करो।'

'अरे मैं तो मजाक कर रही थी।' दरअसल बुआ के दोनों बेटे कुछ खास नहीं कर रहे हैं। कभी बेटों की माँ होने का उन्हें बड़ा दर्प था। इसलिए भाई के दोनों बच्चों से खार खाये रहती थी।

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'ऐसा कोई मजाक होता है।' दादी ने डपटा। 

बुआ चुप हो गई, लेकिन उनका मकसद पूरा हो गया था। 

इन बातों पर कभी ध्यान न देने वाली केया की आँखें न जाने क्यों नम हो गई। अच्छा हुआ पापा के कानों में ये बात न पड़ी, वो भी नहाकर पीला कुर्ता पहन आ गए थे। हर साल की तरह दोनों भाई बहन ने सरस्वती जी की पूजा की। लेकिन घर का माहौल बोझिल हो गया था। घरेलू सहायक सगुना आलूबड़े और सैंडविच के नाश्ते की तैयारी कर रही थी। सब पूजा के बाद खाने जा ही रहे थे कि घर के सामने कार रुकी। उसमें से पापा के आर.एम.तिवारी जी अपनी पत्नी और दोनों बेटों के साथ उतरे। 

पापा ने उनका स्वागत किया, तिवारी जी बोले 'वाह मिश्रा जी केसरिया भात की बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है।'

'जी सर आज बसंत पंचमी है न, अभी आप सबके लिए लगवाता हूँ।'

सगुना की मदद से सारा डाइनिंग टेबल सज गया। उन सबको सब कुछ बहुत अच्छा लगा।

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नाश्ते के बाद तिवारी जी बोले 'मिश्रा जी हमारे बड़े बेटे बसंत के बारे में तो आप जानते ही है, मुंबई आई.आई.टी. से पासआउट, मुंबई में ही मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पैकेज पर जॉब कर रहा है।'

'जी सर जानता हूँ न, बहुत ही लायक बेटा है आपका।' पापा बोले।

'तो भई शादी के नाम से ही बिदकने वाले हमारे बेटे को आपकी बिटिया केया पसंद आ गई है।' तिवारी जी बोले।

'केया को न्यू ईयर की पार्टी में बसंत का उसे मुग्ध भाव से निहारना याद आ गया, उस दिन से वो आँखें उसे बैचेन किए हैं।' 

'इतना अच्छा दामाद मिलना तो भाग्य की बात है।' दादी बोली। 

'कित्ता सजीला लड़का, ऐसा ही दामाद तो मैं चाहती थी, सपने ऐसे भी सच होते हैं क्या।' यामिनी ने सोचा।

'माँ की हाँ तो हमारी भी हाँ, क्यों यामिनी-केया।' मिश्रा जी बोले।

'जी, जी बिलकुल'। यामिनी बोली। 

तभी केया शरमाकर अंदर जाने लगी। 

'अरे ! केया बेटा शायद तुम्हें हमारे बेटे का नाम पसंद न आए, थोड़ा पुराना-सा है, दरअसल ये बसंत पंचमी के दिन ही जन्मे हैं, तो हमारी माँ ने इनका नाम बसंत ही रख दिया। तिवारी जी बोले। 

'जी ऐसी बात नहीं है।' केया के मुँह से निकल गया।

'याने पसंद है।' तिवारी जी की इस बात पर सब हँस दिए।

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'अब हमारी बिटिया इतनी सुंदर साड़ी पहने तैयार ही है, तो हम शगुन कर देते हैं, ये कह उन्होंने केया को कंगन पहना दिए।' 

केया को अपने जीवन का बसंत मिल गया था।

( कहानी - बरखा शुक्ला )

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