MP News: 36 साल से कागजों में घूम रहा ओंकारेश्वर राष्ट्रीय उद्यान, तीन दशक में सिर्फ एक कमरा बना

ये कागजों से ही बाहर नहीं निकल पा रहा है। करीब साढ़े तीन दशक में सिर्फ एक कमरा ही बन पाया है। क्या वजह है, क्यों आकार नहीं ले पा रहा

MP News: 36 साल से कागजों में घूम रहा ओंकारेश्वर राष्ट्रीय उद्यान, तीन दशक में सिर्फ एक कमरा बना

खंडवा से अविनाश रावत रिपोर्ट

खंडवा। ओंकारेश्वर राष्ट्रीय उद्यान का सपना 36 साल बाद भी अधूरा है। ये कागजों से ही बाहर नहीं निकल पा रहा है। करीब साढ़े तीन दशक में सिर्फ एक कमरा ही बन पाया है। क्या वजह है, क्यों आकार नहीं ले पा रहा ओंकारेश्वर राष्ट्रीय उद्यान, पढ़िए बंसल न्यूज की पड़ताल।

1987 में वन्य प्राणियों के लिए बननी थी समिति

ओंकारेश्वर में नर्मदा नदी पर इंदिरा सागर परियोजना के लिए 7 अक्टूबर 1987 को परमिशन जारी की गई थी। तब 41 हजार 111 हेक्टेयर गैर वानिकी वन भूमि उपयोग के लिए भारत सरकार ने दी थी।

इसकी अनुमति के बिंदु क्रमांक 9 में अनिवार्य शर्त रखी गई थी कि वन्य प्राणियों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए राज्य सरकार एक समिति बनाएगी।

1988 को समिति का हुआ था गठन

इस समिति में भारत सरकार के प्रतिनिधि भी सदस्य होंगे। 8 जनवरी 1988 को समिति का गठन हो गया। इसके बाद ओंकारेश्वर इंदिरा सागर परियोजना के लिए भारत वन्य जीव संस्थान देहरादून और भोपाल की फ्रेंड्स ऑफ नेचर सोसायटी को नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण ने जीव-जंतुओं, वन्य प्राणियों और वनस्पतियों के साथ आश्रित मानवीय पहलुओं का आंकलन करने के लिए कंसलटेंट नियुक्त किया।

वन्य प्राणियों के पुनर्वास पर तैयार की थी रिपोर्ट

इन सभी ने मिलकर डूब क्षेत्र में आने वाले वन्य प्राणियों के पुनर्वास का इंतजाम करने को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। इसी रिपोर्ट के आधार पर मुख्य वन्य प्राणी अभिरक्षक ने 760 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को वन्य प्राणी संरक्षण के लिए प्रस्ताव भी तैयार कर लिया।

2004 में राष्ट्रीय उद्यान की अधिसूचना हुई थी जारी

प्रस्ताव के मुताबिक 23 अप्रैल 2004 को नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, पीसीसीएफ एमपी, एनवीडीए के सदस्य और भारतीय वन प्रबंधन संस्थान समेत कई सदस्यों ने डूब में आने वाले पूरे क्षेत्र का जायजा लेकर वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत एक राष्ट्रीय उद्यान, दो वन्य प्राणी अभ्यारण्य, एक कंजरवेशन रिजर्व बनाने की अधिसूचना भी प्रकाशित करने के लिए तैयार कर ली।

अधिसूचना में 140 लोगों का स्टाफ का जिक्र

लेकिन आज तक ना तो ये अधिसूचना प्रकाशित हो पाई है और ना ही ओंकारेश्वर राष्ट्रीय उद्यान धरातल पर उतर पाया है। आलम ये है कि ओंकारेश्वर राष्ट्रीय उद्यान के नाम पर बड़वाह के पास सिद्धवरकूट वाले रास्ते पर सिर्फ एक चौकी बनाई गई है। इस पर भी ताला जड़ा रहता है।

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बंसल न्यूज की पड़ताल के मुताबिक अधिसूचना का जो ड्राफ्ट तैयार किया गया था, उसमें राष्ट्रीय उद्यान के लिए 140 लोगों का स्टाफ भी सेंसन किया गया था। ओंकारेश्वर राष्ट्रीय उद्यान के लिए जारी किए गए बजट से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों पर गौर करें तो हकीकत सामने आती है।

2005 में 4.69 करोड़ बजट का मिला

5 साल के लिए 37.5 करोड़ एनवीडीए दिए गए थे। लेकिन अब तक खर्च नहीं हो पाया 2004 में 7.29 करोड़ का बजट मिला। 1.26 करोड़ आवंटन भी हुए, लेकिन विभाग सिर्फ 27 लाख ही खर्च कर पाया। 2005 में 4.69 करोड़ बजट का मिला।

3.12 करोड़ जारी हुए, लेकिन 1.61 करोड़ का ही इस्तेमाल हुआ। 2006 में 12.30 करोड़ रुपए का प्रावधान हुआ,  6.38 करोड़ जारी हुए,  इसमें भी 5.62 करोड़ का ही उपयोग हुआ।

2010 में 9.56 करोड़ बटज का प्रावधान

2007 में 11.3 करोड़ रुपए का प्रावधान हुआ जो पूरा आवंटित भी हो गया लेकिन उपयोग सिर्फ 6.68 करोड़ का हो पाया। 2008 में 2.68 करोड़ का प्रावधान हुआ। 2.57 का आवंटन मिला और उपयोग हुआ 2.14 करोड़ का।

2009 में 16.35 करोड़ बजट का प्रावधान हुआ।  8.33 करोड़ आवंटित हुआ और 8.22 करोड़ का उपयोग हुआ। 2010 में 9.56 करोड़ बटज का प्रावधान हुआ।

2013 में 12.43 करोड़ का प्रावधान

9.92 करोड़ का आवंटन होने के बाद 9.33 करोड का उपयोग हुआ। 2011 में 12.19 करोड़ का प्रावधान रखा गया। आवंटित हुए 3.49 करोड़ और उपयोग हुआ 3.30 करोड़ का।

2012 में 5.65 करोड़ का प्रावधान हुआ, लेकिन इस बार प्रावधान से ज्यादा 7.47 करोड़ रुपए का आवंटन कर दिया गया।

इसमें से 5.07 करोड़ ही उपयोग हुए। 2013 में 12.43 करोड़ का प्रावधान हुआ। 7.28 करोड़ आवंटित हुए और उपयोग किए गए 7.27 करोड़ रुपए।

जहां राष्ट्रीय उद्यान बनना है, वहां लोग वेखौफ बना रहे दाल-बाफले….

ओंकारेश्वर राष्ट्रीय उद्यान की पड़ताल करने के लिए बंसल न्यूज की टीम बड़वाह और ओंकारेश्वर से लगे इन जंगलों के बीच उन इलाकों तक पहुंची जहां कायदे से बिना अनुमति किसी को प्रवेश तक नहीं दिया जाना चाहिए। पड़ताल के मुताबिक ओंकारेश्वर राष्ट्रीय उद्यान का मुख्य प्रवेश द्वार सिद्धवरकूट के पास मांडाझोल गांव में बनना है।

चौकीदार का एक कमरा मिला

यहां पानी पर्याप्त है वन्य क्षेत्र का घनत्व भी अधिक है। पहाड़ी क्षेत्र है। यानी हर लिहाज से राष्ट्रीय उद्यान के लिए मुफीद है। फिलहाल यहां प्रवेश द्वार के नाम पर एक बैरियर लगा है जहां लोगों को रोका या टोका नहीं जाता। पास ही में ओंकारेश्वर राष्ट्रीय उद्यान लिखा हुआ चौकीदार का एक कमरा बना है जिस पर ताला लगा है।

वन विभाग के अधिकारी उदासीन

पूछने पर पता चला कि इसका चौकीदार कभी कभार ही यहां दिखता है। इसे साफ पता चलता है कि एनवीडीए और वन विभाग के अधिकारी ओंकारेश्वर राष्ट्रीय उद्यान को लेकर कितने संजीदा है।

अब देखना यह होगा कि 36 साल से चली आ रही कागजी कार्रवाई के बाद क्या वाकई राष्ट्रीय उद्यान धरातल पर उतर पाएगा या राष्ट्रीय उद्यान के लिए प्रस्तावित जंगलों में यूं ही दाल-बाफलों की पार्टियां होती रहेंगी।

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