Narottam Mishra: जिन्हें BJP का संकटमोचक कहा जाता है, जानिए उनकी कहानी

Narottam Mishra

भोपाल। आज हम स्टोरी ऑफ द डे में बात करने वाले हैं, शिवराज सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले नरोत्तम मिश्रा की। दतिया सीट से छह बार के विधायक और शिवराज कैबिनेट में गृह और स्वास्थ्य विभाग संभाल रहे नरोत्तम मिश्रा को मप्र भाजपा के कद्दावर नेताओं में जाना जाता है। उनका जन्म 15 अप्रैल, 1960 को ग्वालियर में डॉ. शिवदत्त मिश्रा के घर हुआ था। नरोत्तम बचपन से ही मिलनसार थे। पहले आरएसएस और फिर एबीवीपी के साथ जुड़कर उन्होंने अपनी राजनीतिक करियर की शुरूआत की।

छात्र राजनीति से हुई करियर की शुरूआत

सबसे पहले वे साल 1978 में जीवाजी विश्ववद्यालय में छात्रसंघ के सचिव बने। इसके बाद, उन्होंने आज तक राजनीति में पीछे मुड़कर नहीं देखा। छात्रसंघ सचिव बनने के बाद बीजेपी युवा मोर्चा के प्रान्तीय कार्यकारिणी के सदस्य बनें। इसके बाद साल 1985-87 में उन्हें एमपी भाजपा के प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बनाया गया। साल 1990 में पहली बार वे विधानसभा पहुंचे। उनके राजनीतिक सूझबूझ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पहली बार विधानसभा पहुंचते ही उन्हें विधानसभा सचेतक बना दिया गया था।

सबसे पहले 1998 में बनें विधायक

नरोत्तम साल 1998 में दूसरी बार, 2003 में तीसरी बार, 2008 में चौथी बार, 2013 में पांचवीं बार और 2018 में छठी बार विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। सबसे पहले जून 2005 में उन्हें बाबूलाल गौर की सरकार में राज्य मंत्री के रूप में शामिल किया गया था। नरोत्तम अपने स्वभाव की वजह से लोगों के बीच आसानी से घुलमिल जाते हैं। यही कारण है कि उन्होंने राजनीति के मैदान पर अपना वर्चस्व बनाया हुआ है।

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शिवराज के भरोसेमंद हैं

वर्तमान में मध्य प्रदेश की सियासत में नरोत्तम मिश्रा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सबसे भरोसेमंद माने जाते हैं। शुरूआत से ही शिवराज ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया हुआ है। नरोत्तम को गुणा-भाग की राजनीति में माहिर माना जाता है। कहा जाता है कि कमलनाथ की सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए जो ऑपरेशन लोटस चलाया गया था, उसमें इनकी अहम भूमिका थी।

बीजेपी के संकटमोचक

प्रदेश में बीजेपी जब भी परेशान होती है। नरोत्तम मिश्रा संकटमोचक के रूप में खड़े नजर आते हैं। यही कारण है कि सत्ता में वापसी के बाद बीजेपी के अंदर से ही उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठने लगी थी। लेकिन उन्होंने साफतौर पर इन बातों से इंकार कर दिया था। दरअसल, वो किसी भी हाल में बस कमलनाथ की सरकार गिराना चाहते थे। क्योंकि जब कांग्रेस सरकार में आई थी तो उनके निशाने पर नरोत्तम मिश्रा थे। जांच के बहाने उन्हें टारगेट किया जा रहा था। ऐसे में नरोत्तम मिश्रा ने कमलनाथ विरोधियों को लामबंद करना शुरू कर दिया था और आखिरकार काफी रस्साकशी के बाद 20 नवंबर 2020 को कमनाथ ने प्लोर टेस्ट से पहले ही इस्तीफा दे दिया।

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