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मुंगावली की पहचान 'खुली जेल' को नीलाम करने की तैयारी, यहां रहते थे कुख्यात डाकू

मुंगावली की पहचान 'खुली जेल' को नीलाम करने की तैयारी, यहां रहते थे कुख्यात डाकू

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News Bansal
मुंगावली की पहचान 'खुली जेल' को नीलाम करने की तैयारी, यहां रहते थे कुख्यात डाकू

मुंगावली: शहर की पहचान रही खुली जेल, इन दिनों अपने अस्तित्व को लेकर खतरे में हैं दरअसल इस जेल परिसर में एक समय में ग्वालियर चंबल के खूंखार 72 समर्पित डकैतों को रखा गया था। अब इन दिनों खंडहर में तब्दील हो चुकी जेल पर अपने अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है।

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खंडहर में तब्दील हुई ये वो खुली जेल है जो 70 के दशक में अशोकनगर जिले की पहचान हुआ करती थी। वक्त के साथ दीवारों और छत ने साथ छोड़ा तो अब इस एतिहासिक पहचान पर भी संकट मंडराने लगा है। ऐतिहासिक इमारत को नीलाम करने की तैयारी प्रशासन कर रहा है। यही वजह है कि सुनसान पड़ी इस जेल में इन दिनों जेल विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारियों की हलचल भी बढ़ रही है।

सन् 1973 में शुरु की गई थी जेल

ये जेल 1973 में शुरु की गई थी, जिससे आसपास के लोगों की कई यादें भी जुड़ी हैं। लोगों के जहन वो यादें भी ताजा है जब कुख्यात डकैत मोहर सिंह और माधो सिंह जैसे डाकू यहां रहा करते थे। ग्वालियर चंबल इलाके के बीहड़ों के 72 डाकूओं को इस जेल ने अपनी दीवारों के अंदर रखा था और लोग वो किस्से आज भी सुनाते हैं।

लोगों के जहन में जेल से जुड़ी यादें, मायूस हुए लोग

एतिहासिक इमारत की नीलामी की खबर के बाद लोगों में मायूसी है। वहीं राजस्व मंत्री भी भरोसा दिला रहे हैं कि इस विरासत को सहेजा जाएगा। खुली जेल भले ही खंडहर हो चुकी है। लेकिन उससे जुड़ी यादें आज भी लोगों के जहन में ताजा है। क्योंकि यही वो इमारत है जो एक समय जिले की पहचान थी और अगर नीलामी हुई तो पहचान मिट जाएगी और खुली जेल सिर्फ किताबों की बातें ही बनकर रह जाएगी।

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