MP: स्केटबोर्ड वाला गांव, जिसकी तस्वीर बदली एक विदेशी महिला ने और आज यहां के बच्चे 30 से ज्यादा मेडल ला चुके हैं

MP: स्केटबोर्ड वाला गांव, जिसकी तस्वीर बदली एक विदेशी महिला ने और आज यहां के बच्चे 30 से ज्यादा मेडल ला चुके हैंMP: Skateboarding village, whose picture was changed by a foreign woman and today children here have brought more than 30 medals nkp

MP: स्केटबोर्ड वाला गांव, जिसकी तस्वीर बदली एक विदेशी महिला ने और आज यहां के बच्चे 30 से ज्यादा मेडल ला चुके हैं

सागर। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में एक गांव है जनवार, लोग इस गांव को स्केटबोर्डिंग वाले गांव के नाम से भी जानते हैं। यह गांव आदिवासी बाहुल्य है। लेकिन इस गांव के लड़के-लड़कियां दुनिया में नाम कमाते हैं। स्केटबोर्डिंग के कारण 'जनवार गांव' आज से 5-6 साल पहले अचानक से सुर्खियों में आ गया था। तब गांव की एक बेटी आशा गोंड़ को चार पहियों की रफ्तार ने स्टार बना दिया था।

गांव के बच्चे अतंरराष्ट्रीय स्तर पर मचा चुके हैं धूम

इस गांव के स्केटिंग में माहिर बच्चे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेकर धूम मचा चुके हैं। पन्ना जिले का यह आदिवासी बहुल गांव जिला मुख्यालय से महज 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कुछ वर्ष पहले तक इस गांव में सड़क व बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं तक नहीं थी। गांव में आय का एकमात्र स्रोत जंगल से लकड़ी इकट्ठा करना और बेचना था। लेकिन स्केटिंग ने पिछले 5-6 सालों में इस गांव की तस्वीर बदल दी है।

एक विदेशी महिला ने बदल दी गांव की किस्मत

आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि आचानक से जिस गांव में मूलभूत सुविधाएं नहीं थी वहां के बच्चे स्केटिंग करने लगे। दरअसल, इस बदलाव का श्रेय किसी सरकार या प्रशासनिक अधिकारी को नहीं बल्कि एक विदेशी महिला को जाता है। जिन्होंने इस खेल के जरिए गांव के बच्चों को न सिर्फ ट्रेंड किया, बल्कि ग्रामीणों को भी उनकी संकीर्ण सोच से भी बाहर निकाला।

जर्मनी से पन्ना घूमने आई थीं उलरिके रेनहार्ट

जर्मनी की रहने वाली उलरिके रेनहार्ट एक बार पन्ना घूमने आई थीं। यहां की गरीबी और पिछड़ापन देखकर उन्होंने गांव के लिए करने की सोची और फिर गांव के लड़कों की प्रतिभा को देखते हुए उन्होंने यहां स्केटिंग की शुरुआत कराई। स्केटिंग सीख और खेल तो सिर्फ बच्चे रहे थे लेकिन बदल पूरा गांव रहा था। पांच साल पहले तक जिस जनवार गांव के घरों में फावड़ा, गैंती और तसला रखे नजर आते थे, वहां अब स्केटबोर्ड नजर आते हैं।

आशा गोंड़ गांव की पहली लड़की जो विदेश गई

आज के समय में गांव के शत-प्रतिशत बच्चे अब पढ़ते हैं, क्योंकि उलरिके रेनहार्ट ने गांव के लिए एक नियम बनाया था कि स्कूल नहीं तो स्केट बोर्ड भी नहीं। स्केट बोर्ड के कारण जनवार गांव की स्केट गर्ल आशा गोंड़ पहली लड़की है, जो गांव की तंग गलियों से निकलकर देश की सरहदों को पार करते हुए विदेश गई। वो आज आत्मविश्वास के साथ फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती है। उसने वर्ष 2018 में चीन के नानजिंग शहर में आयोजित एशियाई देशों की स्केटिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था।

गांव के बच्चे 30 से अधिक मेडल जीत चुके हैं

आशा के अलावा इस गांव के दर्जनभर बच्चों ने विशाखापट्टनम में साल 2019 में आयोजित राष्ट्रीय रोलर स्केटिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लिया और दो गोल्ड मेडल सहित पांच मेडल जीते थे। अभी तक की बात करें तो गांव के बच्चे राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में 30 से अधिक मेडल जीत चुके हैं। उलरिके रेनहार्ट तो आज जर्मनी लौट चुकी हैं लेकिन उनके द्वारा शुरु किए गए काम यहां के बच्चों की जिंदगी बदल रहे हैं। जनवार के बच्चे अब कंप्यूटर चलाना जानते हैं। यहां एक कमरे में चल रहा कंप्यूटर सेंटर उलरिके के सहयोग से ही चलता है। वो इसके लिए हर महीने आर्थिक मदद करती हैं।

Image source- #HTGroundGlass

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