सागर जिलाध्यक्षों का ऐलान: भार्गव-राजपूत का दबदबा बरकरार, Bhupendra Singh फिर दरकिनार

MP Sagar District President: बीजेपी ने जिला अध्यक्षों के नामों का ऐलान करना शुरु कर दिया है। अबतक ऐलान हुए जिलाध्यक्षों के 32 नामों में सबसे ज्यादा चर्चा सागर जिले को लेकर हो रही है।

Sagar District President

MP Sagar District President: लंबे इंतजार के बाद बीजेपी ने जिला अध्यक्षों के नामों का ऐलान करना शुरु कर दिया है। भाजपा ने रविवार को दो, सोमवार को 18 और मंगलवार को बीजेपी ने 12 नामों का ऐलान किया। अबतक ऐलान हुए जिलाध्यक्षों के 32 नामों में सबसे ज्यादा चर्चा सागर जिले को लेकर हो रही है। 

सागर में पहली बार दो जिलाध्यक्ष नियुक्त

publive-imageदरअसल, सागर (Sagar District President) को लेकर ही बीजेपी के अंदरखानों में खींचतान थी। जैसा कि माना जा रहा था, बीजेपी ने पहली बार यहां दो जिला अध्यक्ष नियुक्त किए हैं। श्याम तिवारी को शहरी जिलाध्यक्ष तो वहीं रानी कुशवाहा ग्रामीण जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

भूपेंद्र सिंह एक बार फिर दरकिनार

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संभाग में श्याम तिवारी जहां कैबिनेट मंत्री गोविंद सिंह राजपूत की पसंद हैं तो वहीं रानी कुशवाहा पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव के खेमे से आती है। जिलाध्यक्षों (Sagar District President) की नियुक्ति में भार्गव-राजपूत का दबदबा एक बार फिर बरकरार दिखा। वहीं, भूपेंद्र सिंह एक बार फिर दरकिनार हो गए।

दरअसल भूपेंद्र सिंह, पूर्व सांसद राजबहादुर सिंह को शहर अध्यक्ष बनवाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने संगठन में अपनी बात भी रखी थी। लेकिन, एक बार फिर उनकी इस डिमांड को दरकिनार कर दिया गया। दरअसल, ये तीनों क्षत्रप अपनी-अपनी पसंद के करीबी को जिले की कमान सौंपना चाहते थे।

कांग्रेस से आए गोविंद सिंह राजपूत मोहन कैबिनेट का हिस्सा

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दिलचस्प है कि सरकार में मंत्री रह चुके गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह को मोहन मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली। जबकि कांग्रेस से बीजेपी में आए गोविंद सिंह राजपूत मोहन कैबिनेट का हिस्सा हैं। हैरानी की बात यह भी है कि सागर से सिर्फ एक मंत्री बनाया गया जो गोविंद सिंह राजपूत ही हैं। इसे लेकर गोपाल-भूपेंद्र की नाराजगी भी गाहे बगाहे सामने आती रही है। 

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क्या कहते हैं राजनीतिक विश्लेषक?

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो गोविंद सिंह राजपूत का गुट मजबूत होने से गोपाल-भूपेंद्र अपनी-अपनी पसंद के जिलाध्यक्षों की नियुक्ति चाहते थे। लेकिन दोनों में से सिर्फ गोपाल भार्गव ही कामयाब हो पाए। अब देखने लायक होगा कि भूपेंद्र सिंह बुंदेलखंड की सियासी हवा को भांप कर किस तरह का कदम उठाएंगे।

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