MP News: अस्पतालों में सप्लाई हो रही ऑक्सीजन अशुद्ध! ड्रग इंस्पेक्टरों को नहीं पता जांच का तरीका

इंदौर में काम कर रहे कई ड्रग इंस्पेक्टरों को यह भी पता नहीं है कि ऑक्सीजन का सैंपल कैसे लेना है और जांच के लिए कहां भेजना है।

MP News: अस्पतालों में सप्लाई हो रही ऑक्सीजन अशुद्ध! ड्रग इंस्पेक्टरों को नहीं पता जांच का तरीका

इंदौर से अविनाश रावत की रिपोर्ट। शुद्धता की जांच सिर्फ खाने-पीने की चीजों या सोना-चांदी में ही जरुरी नहीं है, बल्कि अस्पतालों में भर्ती मरीजों को लागई जाने वाली ऑक्सीजन भी शुद्ध होना जरूरी है।

ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 में इसके लिए बाकायदा प्रावधान भी किए गए हैं। इन सबके बावजूद इंदौर सहित प्रदेशभर के अस्पतालों में बिना जांच के ही ऑक्सीजन की सप्लाई हो रही है।

स्वास्थ्य विभाग नहीं कर रहा जांच

ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली एजेंसियां जितनी शुद्धता बता रही हैं, अस्पताल प्रबंधन से लेकर स्वास्थ्य विभाग का महकमा उसी को सच मानकर चल रहा है।

जबकि ऑक्सीजन को ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 में लाइव सेविंग ड्रग मानते हुए नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंसियल मेडिसिन में शामिल किया गया है।

इसका सैंपल लेकर उसकी जांच करने की जिम्मेदारी प्रदेशभर के ड्रग इंस्पेक्टरों की है। ऑक्सीजन जनरेटर इंपोर्ट करने या अस्पतालों में लगाने को लेकर भी मानक तय किए गए हैं कि ऑक्सीजन की शुद्धता हर हाल में 99.99 फीसदी शुद्ध होना चाहिए।

इसलिए जरूरी है ऑक्सीजन की शुद्धता?

पन्ना जिले के निवासी रतिराम ठाकुर मस्तिष्क से संबंधित बीमारी का इलाज कराने के लिए पिछले साल सिंतबर माह में शहर के एक अस्पताल में भर्ती हुए।

यहां डॉक्टरों ने उनका ऑपरेशन किया। जरूत पड़ने पर ऑक्सीजन चढ़ाई गई। ऑपरेशन के बाद वे ठीक हो गए, लेकिन कई चीजें भूलने लगे।

परिजनों ने मुंबई के अस्पताल में दिखाया, तब डॉक्टरों ने आशंका जताई कि पिछले इलाज के दौरान ऑक्सीजन की शुद्धता काम होने से ऐसा हो सकता है। चीजों को याद रखने के लिए उन्हें अब नियमित तौर पर दवाएं लेनी पड़ रही हैं।

इसी तरह बिहाड़िया निवासी मंगेश पाठक ने अपने पिता का ब्रेन हेमरेज का ऑपरेशन शहर के एक निजी अस्पताल में कराया।

ऑपरेशन के दौरान उन्हें ऑक्सीजन चढ़ाई गई। कुछ दिन बाद वे भी चीजें भूलने लगे। सात ही उन्हें आंखों की तकलीफ भी होने लगी। डॉक्टरों ने बताया कि ऑक्सीजन की कमी के कारण इस तरह की समस्या हो रही है।

क्‍यों नहीं हो रही जांच?

बंसल न्यूज की पड़ताल के मुताबिक इससे संबंधित चीजों की जांच करने के लिए एक ही बैच के एक साथ चार सैंपल लेना होता है। इन्हें जांच के लिए भी एक साथ भेजना होता है।

इनकी रिपोर्ट के आधार पर ही संबंधित के खिफाल कार्रवाई होती है। ऑक्सीजन का सैंपल लेने में यही सबसे बड़ी परेशानी है।

पहली बात तो ऑक्सीजन गैस है इसलिए सिलेंडर से उसके सैंपल निकालना ही बड़ा चैलेंज है। फिर एक बैच तय करना भी मुश्किल है और इसे जांच के लिए भेजने तक स्टोर करने में कई परेशानी होती है।

इसलिए ड्रग इंसपेक्टर यह माल लेते है कि एजेंसियों द्वारा जो ऑक्सीजन सप्लाई की जा रही है वह 99.9 फीसदी शुद्ध है।

ड्रग इंस्पेक्टरों नहीं आता सैंपल लेना

चौंकाने वाली बात तो यह है कि इंदौर में काम कर रहे कई ड्रग इंस्पेक्टरों को यह भी पता नहीं है कि ऑक्सीजन का सैंपल कैसे लेना है और जांच के लिए कहां भेजना है।

बता दें कि अस्पतालों में ऑक्सीजन सप्लाई करने के लिए राज्य शासन ने प्रदेशभर में करीब 25 एजेंसियों को अधिकृत किया है। अस्पतालों को इन्हीं एजेंसी से ऑक्सीजन लेना होती है।

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