MP High Court: 8 महीने के गर्भ पर हाईकोर्ट का फैसला, मां-बच्चे की सुरक्षा को प्राथमिकता, रेप पीड़िता का अबॉर्शन से इनकार

MP High Court: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक नाबालिग रेप पीड़िता को आठ महीने के गर्भ को पूरा करने की अनुमति दी है। मेडिकल रिपोर्ट में बताया गया कि गर्भपात से पीड़िता और गर्भस्थ शिशु की जान को खतरा हो सकता है। यह सुनकर पीड़िता और अभिभावकों ने गर्भपात से इनकार कर दिया।

MP High Court: 8 महीने के गर्भ पर हाईकोर्ट का फैसला, मां-बच्चे की सुरक्षा को प्राथमिकता, रेप पीड़िता का अबॉर्शन से इनकार

हाइलाइट्स

  • मेडिकल विशेषज्ञों ने आठ माह के गर्भपात को बताया जानलेवा।
  • पीड़िता और उसके माता-पिता ने गर्भपात कराने से इनकार किया।
  • हाईकोर्ट ने संवेदनशीलता दिखाते हुए गर्भ को पूर्ण करने की अनुमति दी।

Jabalpur High Court: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (MP High Court) ने संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए एक नाबालिग रेप पीड़िता को अबॉर्शन (abortion) न कराने की अनुमति दी है। मामला आठ माह के गर्भ से जुड़ा था, जिसे लेकर मेडिकल विशेषज्ञों ने संभावित जान का खतरा जताया। इसके बाद पीड़िता और उसके परिजनों ने अबॉर्शन से साफ इनकार कर दिया, जिसे अदालत ने परिवार की इच्छा को स्वीकार करते हुए गर्भ को पूर्ण करने की इजाजत दे दी। अदालत ने प्रशासन को पीड़िता को बेहतर मेडिकल सुविधा देने के निर्देश दिए हैं।

जानें क्या है पूरा मामला?

दरअसल, मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले की रहने वाली एक नाबालिग लड़की रेप का शिकार हुई थी, जिससे वह गर्भवती (pregnant) हो गई। जब तक यह मामला कानूनी प्रक्रिया में आया, तब तक गर्भ की अवधि आठ महीने हो चुकी थी। गर्भपात के लिए बालाघाट जिला अदालत (Balaghat District Court) ने हाई कोर्ट से मार्गदर्शन मांगा था। मामले में बच्ची के गर्भपात की अनुमति के लिए हाईकोर्ट को पत्र लिखा था। इसके बाद बेंच ने इस पत्र को याचिका मानकर सुनवाई की।

मेडिकल टीम की रिपोर्ट के बाद कोर्ट का फैसला

जबलपुर हाईकोर्ट (Jabalpur High Court) के न्यायमूर्ति अमित सेठ की एकलपीठ ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई की। कोर्ट ने 9 जून को मेडिकल बोर्ड का गठन कर यह जानने का निर्देश दिया कि आठ माह का गर्भपात (8 months pregnant minor) सुरक्षित है या नहीं। इसके बाद हाईकोर्ट के समक्ष पूर्व निर्देशों का पालन करते हुए मेडिकल रिपोर्ट पेश की गई।

मेडिकल रिपोर्ट में गर्भपात को बताया खतरनाक

विशेषज्ञ डॉक्टरों ने बताया कि पीड़िता वर्तमान में आठ माह की गर्भवती है। इस अवस्था में गर्भपात करना मां और शिशु दोनों के लिए जानलेवा हो सकता है। इससे मानसिक और शारीरिक नुकसान की भी आशंका है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि यदि गर्भ जारी रखा जाए तो स्थिति अधिक सुरक्षित रह सकती है। यह सुनते ही नाबालिग व उसके अभिभावकों ने गर्भपात से इनकार कर दिया। दरअसल, हाईकोर्ट की 20 फरवरी, 2025 की गाइडलाइन के अंतर्गत यदि कोई नाबालिग रेप पीड़िता 24 हफ्ते (करीब छह महीने) से ज्यादा गर्भवती हो, तो गर्भपात के लिए हाई कोर्ट से मार्गदर्शन लेना होगा। यह आदेश सभी जिम्मेदार विभागों को दिया गया था।

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अभिभावकों और पीड़िता का फैसला

मेडिकल रिपोर्ट देखने और जान को खतरे की बात सुनने के बाद नाबालिग पीड़िता और उसके माता-पिता ने गर्भपात से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि गर्भ को पूर्ण करने की अनुमति दी जाए।

गर्भ पूर्ण करने के लिए दी स्वतंत्रता

कोर्ट ने सभी तथ्यों और रिपोर्टों का संज्ञान लेते हुए कहा कि जब पीड़िता और अभिभावक गर्भपात नहीं चाहते हैं, तो उन्हें पूरी आज़ादी है कि वे गर्भ को पूर्ण करें। साथ ही, प्रशासन को यह भी निर्देश दिए गए कि पीड़िता को बेहतर चिकित्सकीय सुविधा दी जाए। कोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए गर्भ को पूर्ण करने की अनुमति दे दी।

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