विंध्य का सूर्य अस्त: संत परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज ब्रह्मलीन, सीएम मोहन यादव ने धारकुंडी पहुंचकर दी श्रद्धांजलि, आश्रम में होगी समाधि

सतना के विख्यात धारकुंडी आश्रम के संस्थापक परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज 102 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हो गए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रविवार को आश्रम पहुँचकर उनके अंतिम दर्शन किए।

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मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने रविवार को आश्रम पहुँचकर महाराज जी के अंतिम दर्शन किए।

Dharkundi Swami Sachidanand Maharaj Brahmalin: विंध्य अंचल सहित संपूर्ण आध्यात्मिक जगत के लिए शनिवार का दिन एक युग के अंत जैसा रहा। धारकुंडी आश्रम के संस्थापक और लाखों श्रद्धालुओं के आस्था के केंद्र परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज 102 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हो गए। उन्होंने शनिवार दोपहर मुंबई के बदलापुर स्थित आश्रम में अंतिम सांस ली। उनके महाप्रयाण की सूचना मिलते ही सतना जिले के धारकुंडी में शोक की लहर दौड़ गई और उनके अंतिम दर्शनों के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा। रविवार को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल ने धारकुंडी पहुंचकर महाराज के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित किए।

अंतिम दर्शन के लिए उमड़ा जनसैलाब

विंध्य के महान संत और अध्यात्म के शिखर पुरुष परमहंस स्वामी सच्चिदानंद महाराज अब ब्रह्मलीन हो गए हैं। महाराज जी का पार्थिव शरीर मुंबई से धारकुंडी लाया गया है, जहाँ हजारों की संख्या में अनुयायी और साधु-संत उनके अंतिम दर्शनों के लिए पहुँच रहे हैं। जैसे ही गुरुदेव की पार्थिव देह आश्रम पहुंची, संपूर्ण क्षेत्र शोक और श्रद्धा के सागर में डूब गया। अंतिम दर्शन के लिए उमड़े जनसैलाब के बीच पूरा परिसर जयघोष और वैदिक मंत्रोच्चार से गुंजायमान हो उठा।

महाराज जी का जीवन अध्यात्म और सेवा का अद्भुत संगम था। उन्होंने मात्र 22 वर्ष की छोटी उम्र में ही संसार का मोह त्याग कर वैराग्य धारण कर लिया था। इसके बाद उन्होंने विंध्य के बीहड़ों में तपस्या की और धारकुंडी जैसे दुर्गम स्थान को एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में विकसित किया। उनके परलोक गमन से संपूर्ण आध्यात्मिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति हुई है।

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सीएम मोहन यादव ने किए अंतिम दर्शन

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव रविवार को विशेष रूप से धारकुंडी पहुँचे। उन्होंने महाराज जी के पार्थिव शरीर के सम्मुख नमन करते हुए कहा कि पूज्य गुरुदेव का जाना अध्यात्म जगत के लिए ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई संभव नहीं है। सीएम ने कहा कि महाराज जी की साधना और उनके द्वारा स्थापित आदर्श आने वाली पीढ़ियों का मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे।
वे लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था, अध्यात्म और मार्गदर्शन का प्रमुख केंद्र थे। 

उनका सान्निध्य जनमानस को सदैव आध्यात्मिक ऊर्जा, प्रेरणा एवं सकारात्मक दिशा प्रदान करता रहा। उन्होंने कहा कि मैं अपनी सरकार की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। दिव्यात्मा का जाना हम सब के लिए कष्टकारी भी है। मैं बाबा महाकाल से प्रार्थना करता हूं कि अपने धाम में स्थान दें।

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स्वामी जी के अंतिम दर्शन, दी अश्रुपूरित श्रदांजलि

अध्यात्म के शिखर पुरुष के महाप्रयाण पर समूचा विंध्य उमड़ पड़ा। अंतिम दर्शन के लिए उमड़े जनसैलाब के बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल और अन्य जनप्रतिनिधियों ने आश्रम पहुंचकर श्रद्धासुमन अर्पित किए। इस दौरान राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी, सांसद गणेश सिंह, चित्रकूट विधायक सुरेंद्र सिंह गहरवार सहित कई जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक आश्रम पहुंचे और महाराज जी के चरणों में अपनी पुष्पांजलि समर्पित की। स्वामी जी के पार्थिव देह के सम्मुख नतमस्तक होकर सभी ने अश्रुपूरित विदाई दी। 

गेरुआ वस्त्रों में ध्यान मुद्रा में किया विराजित

श्रद्धालुओं के अंतिम दर्शन के लिए पूज्य स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज के पार्थिव शरीर को गेरुआ वस्त्र पहनाकर ध्यान की मुद्रा में गद्दी पर विराजित किया गया। अपने गुरु को इस शांत और अलौकिक स्वरूप में देख भक्त भावुक हो उठे और नम आंखों से उन्हें अंतिम प्रणाम किया। आश्रम प्रबंधन ने बताया कि स्वामी जी की समाधि प्रक्रिया सोमवार को संपन्न होगी।

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स्वयं चुना था अपना विश्राम स्थल

स्वामी जी की दूरदर्शिता ऐसी थी कि उन्होंने अपने जीवित रहते ही स्वयं के समाधि स्थल का चयन कर लिया था। सोमवार को धारकुंडी आश्रम के गर्भगृह में पूरे विधि-विधान और वैदिक परंपरा के साथ उन्हें समाधि दी जाएगी। इस ऐतिहासिक और वैराग्यपूर्ण क्षण के साक्षी बनने के लिए उनके गुरु भाई और प्रसिद्ध संत स्वामी अडगड़ानंद महाराज (सक्तेशगढ़ आश्रम) भी धारकुंडी पहुंच चुके हैं।

त्याग और सेवा की प्रतिमूर्ति: एक महान आध्यात्मिक सफर

स्वामी सच्चिदानंद महाराज का जीवन तपस्या और मानवता के लिए समर्पित रहा। उनके जीवन की कुछ प्रमुख बातें:

  • 22 की उम्र में वैराग्य: उन्होंने बहुत छोटी उम्र में ही संसार का मोह त्याग दिया और अपना जीवन समाज के कल्याण में लगा दिया।
  • सरल उपदेश: उनके प्रवचन केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला थे। उन्होंने लोगों को हमेशा सत्य और संयम के मार्ग पर चलना सिखाया।
  • साहित्यिक योगदान: उन्होंने 'मानस बोध' और 'गीता बोध' जैसे ग्रंथों के जरिए कठिन आध्यात्मिक ज्ञान को आम लोगों की सरल भाषा में पहुँचाया।
  • प्रेरणा पुंज: आश्रम से प्रकाशित उनकी पुस्तकों ने लाखों लोगों के भटकते जीवन को एक नई दिशा और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान की।

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