Ola-Uber और Rapido की बढ़ी मुश्किलें: सुरक्षा नियमों के उल्लंघन पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार और कंपनियों को नोटिस, 4 सप्ताह में मांगा जवाब

इंदौर हाईकोर्ट ने ओला, उबर और रेपिडो जैसी बाइक टैक्सी सेवाओं पर सख्त रुख अपनाया है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार और कंपनियों सहित 10 पक्षों को नोटिस जारी कर 4 सप्ताह में जवाब मांगा है।

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Indore High Court Bike Taxi Notice: मध्यप्रदेश के इंदौर में ओला, उबर और रेपिडो (Ola Uber Rapido) जैसी बाइक टैक्सी सेवाओं की मनमानी अब कानून के घेरे में है। यात्री सुरक्षा के साथ खिलवाड़ और बिना परमिट बाइक टैक्सी चलाने के संगीन आरोपों को लेकर इंदौर हाईकोर्ट (Indore High Court) ने सख्त नाराजगी जताई है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यात्री सुरक्षा और मोटर व्हीकल एक्ट के नियमों की अनदेखी पर केंद्र और राज्य सरकार सहित संबंधित कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने 4 सप्ताह में जवाब मांगा है।

कानून के छात्र ने उठाई सुरक्षा की आवाज

यह पूरा मामला कानून (Law) के छात्र आयुष जाट द्वारा दायर एक जनहित याचिका से सामने आया है। एडवोकेट अमित सिंह सिसोदिया के माध्यम से दायर इस याचिका में बताया गया कि शहर में हजारों की संख्या में ऐसी बाइक टैक्सी चल रही हैं, जिनका पंजीकरण निजी (Private) उपयोग के लिए है, लेकिन वे व्यावसायिक (Commercial) काम कर रही हैं। यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यात्रियों के लिए भी बड़ा जोखिम है।

बिना GPS और परमिट के चल रहे वाहन

कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह गंभीर मुद्दा उठाया गया कि इन बाइक टैक्सियों में न तो GPS लगा है और न ही कोई सेफ्टी अलार्म। ऐसी स्थिति में वाहन की लाइव लोकेशन ट्रैक करना असंभव है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन वाहनों के पास 'पीली नंबर प्लेट' (व्यावसायिक परमिट) नहीं है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि कोई दुर्घटना होती है, तो यात्री न तो बीमा का दावा कर पाएगा और न ही कंपनी की जवाबदेही तय होगी।

कोर्ट ने 10 पक्षों से मांगा जवाब

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय, प्रदेश के गृह विभाग, परिवहन विभाग और प्रमुख कैब कंपनियों (ओला, उबर और रेपिडो सहित अन्य) सहित 10 पक्षों को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने पूछा है कि 'मोटर व्हीकल गाइडलाइंस 2025' और नियमों का पालन अब तक क्यों नहीं सुनिश्चित किया गया? कोर्ट ने सीधे सवाल किया कि व्यावसायिक उपयोग में लगे दोपहिया वाहनों में यात्री सुरक्षा के क्या इंतजाम हैं और इन वाहनों पर जीपीएस क्यों नहीं लगे हैं?

यात्री सुरक्षा पर खड़े हुए सवाल

याचिका में आरोप लगाया गया है कि ओला-उबर और रेपिडो जैसी कंपनियां चालकों के लाइसेंस और वाहनों के फिटनेस की कोई नियमित जांच नहीं करती हैं। बिना किसी सुरक्षा ऑडिट के सड़कों पर चल रहे ये वाहन किसी भी बड़ी अनहोनी को दावत दे रहे हैं।

पुराने आदेशों की अनदेखी

बता दें कि अक्टूबर 2025 में भी हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 66 का पालन करने के आदेश दिए थे। कोर्ट ने अब इस बात पर भी नाराजगी जताई है कि पुराने आदेशों को अब तक जमीन पर क्यों नहीं उतारा गया।

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