खंडवा में तालाबों का काम अधूरा, दाम पूरा: भोपाल से आई टीम के सामने खुली भ्रष्टाचार की पोल, सच बोला तो ग्रामीणों को मारने दौड़ा सरपंच

खंडवा में जल संरक्षण के नाम पर फर्जी दस्तावेजों के जरिए नेशनल अवॉर्ड जीतने का खुलासा हुआ है। भोपाल की हाईलेवल टीम की जांच में पाया गया कि तालाबों का काम अधूरा है लेकिन भुगतान भारी मात्रा में हो चुका है।

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सच बोलने पर ग्रामीणों को दी जान से मारने की धमकी।

Khandwa National Water Award Fraud: मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में जिस 'जल संचयन अभियान' को देश में नंबर-1 बताकर राष्ट्रपति से सम्मानित कराया गया, लेकिन इस अभियान में हुए काम की असलियत अब दंग करने वाली है। भोपाल से आई हाई-लेवल जांच टीम के सामने भ्रष्टाचार की पोल खुलने लगी हैं। 

जांच में 20% काम होने पर भी 70% राशि निकालने और कागजी तालाबों का खुलासा हुआ है। कई तालाब केवल कागजों पर मौजूद हैं और पोर्टल पर AI से बनी तस्वीरें अपलोड की गई थीं। जब ग्रामीणों ने सच बोलने की हिम्मत की, तो उन्हें चुप कराने के लिए सरपंच ने उन पर हमला करने की कोशिश की, उन्हें मारने के लिए पीछे दौड़ लगा दी। घटना से जुड़ा वीडियो भी सामने आया है।

खंडवा में घोटाला, अवॉर्ड असली, काम फर्जी!

मध्यप्रदेश के खंडवा जिले से एक शर्मनाक मामला सामने आया है। जिस जल संरक्षण अभियान के लिए जिला प्रशासन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों देश का पहला पुरस्कार और 2 करोड़ रुपए की राशि प्राप्त की थी, वह अब बड़े घोटाले की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। बुधवार को पुनासा जनपद की हरवंशपुरा पंचायत में भोपाल से आई सीनियर आईएएस अधिकारियों की टीम ने जब जांच शुरू की, तो वहां विकास के नाम पर सिर्फ लूट दिखाई दी।

ग्रामीणों ने बताई सच्चाई, भड़क उठा सरपंच

जांच के दौरान तब तनाव की स्थिति बन गई जब ग्रामीण राजेंद्र, चंपालाल और रामलाल ने जांच टीम को तालाबों की हकीकत बतानी चाही। ग्रामीणों का आरोप है कि सच्चाई सामने आते देख सरपंच दीपक घाटे और उसके परिवार वाले भड़क गए। उन्होंने न केवल ग्रामीणों को जान से मारने की धमकी दी, बल्कि उनकी पिटाई करने के लिए उनके पीछे भी दौड़े। ग्रामीणों ने अब इस मामले की शिकायत पुलिस में करने का निर्णय लिया है।

जमकर भ्रष्टाचार, 20% काम 70% निकाली राशि

भोपाल की हाई-लेवल टीम की जांच में पाया गया कि तालाबों का काम अधूरा है लेकिन भुगतान भारी मात्रा में हो चुका है। सीनियर आईएएस दिनेश कुमार जैन और मनरेगा परिषद के ईएनसी मिर्धा के नेतृत्व में टीम ने 6 खेतों में बने तालाबों का निरीक्षण किया। कागजों में इन तालाबों की लागत 5.30 लाख रुपए दिखाई गई है। मौके पर टीम ने पाया कि काम अभी 20% भी पूरा नहीं हुआ है, जबकि सरकारी खजाने से 3.75 लाख रुपए (लगभग 70%) पहले ही डकार लिए गए हैं।

जल संचयन की जांच, कागजों पर तालाब

ग्रामीणों ने आरोप लगाते हुए कहा कि जनपद के अधिकारी और इंजीनियर जांच टीम को 'गुमराह' करने की कोशिश कर रहे थे। वे टीम को केवल वही हिस्से दिखा रहे थे जहाँ थोड़ा-बहुत काम हुआ है। गांव के 8-10 तालाब तो ऐसे हैं, जिनका अस्तित्व धरातल पर है ही नहीं, वे सिर्फ सरकारी फाइलों में तैर रहे हैं। टीम ने न तो इन 'गायब' तालाबों की सुध ली और न ही डगवैल (कुओं) का भौतिक सत्यापन किया। हालांकि, बढ़ते विरोध को देख टीम ने भरोसा दिलाया है कि जांच का दायरा बढ़ाया जाएगा और एक-एक बिंदु की बारीकी से पड़ताल होगी।

AI तस्वीरों और पोर्टल का खेल

दरअसल, पहले जांच में सामने आया है कि प्रशासन ने नेशनल वाटर अवॉर्ड पाने के लिए पोर्टल पर 1.29 लाख कार्यों की जानकारी दी थी। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से कई काम सिर्फ कागजों पर हैं। कुछ जगहों पर AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से बनाई गई फर्जी तस्वीरें अपलोड की गईं, तो कहीं सूखे खेतों को ही तालाब बताकर करोड़ों का चूना लगाया गया।

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