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MP Employee Stipend Rules Controversy: मध्यप्रदेश में सीधी भर्ती के जरिए नियुक्त कर्मचारियों के लिए लागू किए गए स्टाइपेंड के नियम को लेकर अब सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच खींचतान तेज हो गई है।
जबलपुर हाईकोर्ट द्वारा हाल ही में स्टाइपेंड नियम को निरस्त किया गया है। अब मध्यप्रदेश सरकार द्वारा इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की सुगबुगाहट है। इसको लेकर मंत्रालय सेवा अधिकारी संघ और मध्यप्रदेश निगम मंडल कर्मचारी महासंघ ने मुख्यमंत्री मोहन यादव से तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है, ताकि अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाने से रोका जा सके। उनका कहना है कि सरकार को एक अभिभावक की भूमिका निभानी चाहिए न कि अपने ही कर्मचारियों के खिलाफ कोर्ट में वादी बनकर खड़ा होना चाहिए।
कर्मचारी संगठनों ने उजागर किए यह कानूनी पहलू
मंत्रालय सेवा अधिकारी कर्मचारी संघ अध्यक्ष इंजीनियर सुधीर नायक और निगम मंडल कर्मचारी महासंघ के प्रांताध्यक्ष अजय श्रीवास्तव नीलू ने इस पूरे मामले में कानूनी पहलुओं को उजागर किया है। उन्होंने इस मामले में मुख्यमंत्री मोहन यादव से हस्तक्षेप करने की अपील की है। साथ ही संबंधित अधिकारियों द्वारा किए जा रहे मुकदमेबाजी को रोकने की मांग की है।
एससी की गैर-जरूरी मुकदमेबाजी से बचने की सलाह
मंत्रालय सेवा अधिकारी कर्मचारी संघ अध्यक्ष इंजीनियर सुधीर नायक ने बताया कि एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट से दिए निर्देश पर मध्यप्रदेश सामान्य प्रशासन विभाग ने 18 मई 2010 को एक सर्कुलर जारी किया था। जिसमें कोर्ट ने सरकार को गैर-जरूरी मुकदमेबाजी से बचने की सलाह दी थी।
सरकार के अधिकारियों को निर्देश, कोर्ट में न घसीटें
निगम मंडल कर्मचारी महासंघ के प्रांताध्यक्ष अजय श्रीवास्तव ने बताया कि उस समय सरकार ने स्पष्ट रूप से अपने अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि यदि किसी पक्षकार को न्याय मिल रहा है, तो उसे सिर्फ इसलिए ऊपरी अदालतों में नहीं घसीटना चाहिए कि निर्णय सरकार के खिलाफ है।
युवाओं में निराशा, कई कर्मचारियों ने छोड़ दी नौकरी
सीएम मोहन यादव को लिखे लेटर में कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि अब खुद सरकार अपने ही उस पुराने आदेश की अनदेखी कर रही है। आगे उन्होंने यह भी कहा कि इस स्टाइपेंड व्यवस्था के कारण मध्यप्रदेश के युवाओं में भारी निराशा है। 2024 में नियुक्त कई कर्मचारियों ने इस व्यवस्था के बाद नौकरी छोड़ दी है।
एमपी में तीन साल में स्टाइपेंड देने का यह नियम
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के बाद जब किसी युवा को सरकारी नौकरी मिली है तो उसे शुरुआती तीन साल तक कम वेतन पर रखा जाता है। जिसमें उन्हें अपने क्षेत्र की आर्थिक स्थिति को देखते हुए पहले साल 70 प्रतिशत, दूसरे साल 80 प्रतिशत और तीसरे साल 90 प्रतिशत स्टाइपेंड का नियम है।
भर्ती एजेंसियों के दो अलग-अलग असमान नियम
संगठन के नेताओं के अनुसार, एमपी लोक सेवा आयोग से भर्तियों पर कम वेतन वाली स्टाइपेंड व्यवस्था लागू नहीं है, जबकि कर्मचारी चयन मंडल से नियुक्त कर्मचारियों पर इसे थोपा जा रहा है। एक ही राज्य सरकार के अंदर भर्ती एजेंसियों के लिए दो अलग-अलग नियम समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
MP कर्मचारी मंच की चेतावनी: अपील पर आंदोलन
मध्य प्रदेश कर्मचारी मंच के प्रदेश अध्यक्ष अशोक पांडे ने बताया कि राज्य सरकार प्रोविजन पीरियड में कर्मचारियों के वेतन से ना काटने वाले आदेश पर सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी तो कर्मचारी मंच आंदोलन करेगा। सीएम मोहन यादव से मांग है कि कटौती को एरियार के रूप में भुगतान के आदेश को तत्काल लागू किया जाए।
चौथे साल पूरा वेतन देने के सरकार ने दिए थे आदेश
अध्यक्ष अशोक पांडे ने बताया कि तत्कालीन सरकार ने 2019 में नव नियुक्त सरकारी कर्मचारियों के प्रोविजन पीरियड में वेतन से पहले साल 30%, दूसरे साल 20% और तीसरे साल 10% वेतन काटने और चौथे साल पूरा वेतन दिए जाने के आदेश दिए, जो सरकार का कर्मचारी विरोधी निर्णय है।
HC का सरकार को आदेश: एरियर सहित भुगतान करें
इसके खिलाफ कर्मचारी संगठनों ने हाईकोर्ट में न्याय की गुहार लगाई थी। जिसमें हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिए कि प्रोविजन पीरियड में कर्मचारियों के वेतन से काटने वाले आदेश को तत्काल निरस्त किया जाए। कर्मचारी के वेतन कटौती को एरियर सहित भुगतान किया जाएं।
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