भोपाल में सिनेमा नजर से नजर तक: फिल्म प्यास और ग्वावा-ए मॉब लिंचिंग की स्क्रीनिंग, डायरेक्टर राजीव गोहिल बोले-समाज को यथार्थवादी सिनेमा से ही उम्मीद

भोपाल में सिनेमा नजर से नजर में फिल्म प्यास और ग्वावा-ए मॉब लिंचिंग की स्क्रीनिंग हुई। फेमस फिल्म डायरेक्टर राजीव गोहिल ने कहा कि व्यावसायिक सिनेमा चाहे कितनी प्रगति कर ले, समाज की उम्मीद कला और यथार्थवादी सिनेमा से ही बनी रहेगी।

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Cinema Nazar Se Nazar Tak Bhopal: व्यावसायिक सिनेमा चाहे कितनी प्रगति कर ले, समाज की उम्मीद कला और यथार्थवादी सिनेमा से ही बनी रहेगी। ये बात फिल्म डायरेक्टर, सिनेमेटोग्राफर और स्क्रीनप्ले राइटर प्रो. राजीव गोहिल ने सिनेमा नजर से नजर तक में कही। आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन के कार्यक्रम का आयोजन दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय, शिवाजी नजर भोपाल में हुआ। इसमें फिल्म प्याल और ग्वावा-ए मॉब लिंचिंग की स्क्रीनिंग हुई।

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सिनेमा नजर से नजर तक परिसंवाद का शुभारंभ मां सरस्वती के पूजन से किया गया

फिल्म प्यास

डायरेक्टर - सूर्यान्शु सक्सेना

प्यास एक नौजवान अर्जुन की मार्मिक कहानी है, जो परंपरा और सही कर्म के बीच स्वयं को गहरे द्वंद्व में पाता है। पुजारी बनने की राह पर खड़ा अर्जुन अपने अस्तित्व, आस्था और विश्वासों से जूझता है। यह फिल्म उसकी उस परिवर्तनकारी यात्रा को दर्शाती है, जो उसके स्थापित विश्वासों को तोड़ते हुए उसे जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर ले जाती है। प्यास आत्म-खोज, आध्यात्मिक अन्वेषण और मानवीय हृदय के अनछुए पहलुओं की एक संवेदनशील और गहन कहानी है, जहाँ आस्था और संदेह आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।

ग्वावा - ए मॉब लिंचिंग (Gauva – A Mob Lynching)

डायरेक्टर - राहुल शर्मा (राहुल्य)

निर्माण - स्वर रंग फिल्म्स

निर्माता एवं संगीत - अंतरराष्ट्रीय सितार वादिका स्मिता नागदेव

खजुराहो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में होगी ग्वावा की स्क्रीनिंग

शक्तिशाली और मार्मिक मूक लघु फिल्म ग्वावा - ए मॉब लिंचिंग को प्रतिष्ठित खजुराहो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव 2026 में आधिकारिक स्क्रीनिंग के लिए चुना गया है। 14 मिनट की यह फिल्म 18 जनवरी 2026 को प्रदर्शित की जाएगी।

मॉब लिंचिंग की भयावह सच्चाई पर बनी ग्वावा

बिना किसी संवाद के बनी यह फ़िल्म भारत में बढ़ती भीड़ हिंसा (Mob Lynching) की भयावह सच्चाई पर एक गहरी और झकझोर देने वाली टिप्पणी है। कहानी एक ऐसे निराश्रित व्यक्ति की है, जिसकी पत्नी मृत्युशैया पर है और सारा धन उसके इलाज में खर्च हो चुका है। भूखी छोटी बेटी और पत्नी के लिए भोजन जुटाने की मजबूरी में वह सार्वजनिक स्थान से कुछ उठा लेता है, जिसे क्रोधित भीड़ चोरी समझकर उसका पीछा करती है और अंततः उसे पीट-पीटकर मार डालती है।

फिल्म की चुप्पी इसकी भावनात्मक तीव्रता को और अधिक प्रभावशाली बनाती है। राग मियां की तोड़ी पर आधारित बैकग्राउंड म्यूज़िक, जिसमें सितार और तबले का सशक्त प्रयोग किया गया है, फिल्म को एक गहरे संवेदनात्मक लोक में ले जाता है। न्यूनतम साधनों के बावजूद, यह फ़िल्म मानव गरिमा, गलत सूचना और कानून को अपने हाथों में लेने के विनाशकारी परिणामों पर एक सार्वभौमिक संदेश देती है।

डायरेक्टर राहुल शर्मा (राहुल्य) ने ये कहा

ग्वावा के डायरेक्टर राहुल शर्मा (राहुल्य) ने कहा कि हमने इस फिल्म को भीड़ हिंसा के खिलाफ़ एक मूक चीख के रूप में बनाया है। इसके हर शीर्षक के पीछे अकल्पनीय दर्द की एक मानवीय कहानी छिपी है। उन्होंने आगे कहा कि ग्वावा - ए मॉब लिंचिंग आत्मनिरीक्षण, सहानुभूति और आवेगी रोष के इस दौर में संवैधानिक न्याय के पालन के लिए एक हार्दिक अपील है।

'समाज की उम्मीद कला और यथार्थवादी सिनेमा से ही बनी रहेगी'

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संवाद एवं विमर्श के गहन वैचारिक सत्र के दौरान फिल्म डायरेक्टर राजीव गोहिल एवं वरिष्ठ पत्रकार पंकज शुक्ला

फिल्म प्रदर्शन के बाद डायरेक्टर प्रो. राजीव गोहिल के साथ संवाद एवं विमर्श का गहन वैचारिक सत्र आयोजित किया गया। इस सत्र में प्रो. राजीव गोहिल ने भारतीय सिनेमा के इतिहास और सिनेमा की यात्रा में आए सामाजिकता और राजनैतिक पक्षों पर चर्चा की। सिनेमा और कला के महत्व पर जोर देते हुए प्रो. गोहिल ने इस सत्र में कहा कि व्यावसायिक सिनेमा चाहे कितनी प्रगति कर ले, समाज की उम्मीद कला और यथार्थवादी सिनेमा से ही बनी रहेगी। इस सत्र में संवादकर्ता के रूप में पत्रकार एवं स्तंभकार (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं वेब मीडिया) पंकज शुक्ला ने सिनेमा और राजीव गोहिल की इस संदर्भ में विशेषज्ञता को जोड़कर गहरे प्रश्न किए।

कार्यक्रम की उपयोगिता से जोड़कर विशद टिप्पणी के साथ डॉ वीणा सिन्हा ने आभार प्रकट किया। कार्यक्रम का सफल संचालन विशाखा राजुरकर और अपर्णा पात्रिकर ने किया। प्रो. आर के शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत किया और लव चावड़ीकर ने समन्वयन किया।

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