रोचक जानकारी: देश की पहली संसद में मध्यप्रदेश के सागर का हुआ करता था जलवा

रोचक जानकारी: देश की पहली संसद में मध्यप्रदेश के सागर का हुआ करता था जलवा

भारत में जब पहली संसद का गठन किया गया था तब मध्यप्रदेश के सागर का अपना अलग ही जलवा रहा है। सदन में सगर के नेताओं को काफी दबदबा हुआ करता था। पहली संसद के गठन के दौरान एक सागर के नेता और एक सागर के पास के शहर मालथौन के निवासी का दबदबा रहा। जब भारत में ब्रिटिश राज था तब सन 1919 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के बाद सन 1920 में अंग्रेजों ने पहली बार आम चुनाव कराए थे। उस समय मध्यप्रदेश के सागर से हरिसिंह गौर की डेमोक्रेटिक पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरकर सामने आई थी।

उस समय लोकसभा यानी उस समय कही जाने वाली सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में डॉ हरिसिंह गौर ने 48 सीटें जीती थी। जबकि अन्य उम्मीदवार स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनकर आए थे। बता दें कि आजकल जिस तरह से सदन का नेता प्रधानमंत्री होता है। उन दौर में ऐसा नहीं होता था। क्योंकि उस समय शासन की कमान अंग्रेजों के हाथों में थी। लेकिन सदन के नेता को डिप्टी प्रेसिडेंट कहा जाता था। वही राज्यसभा को कौंसिल ऑफ स्टेट कहा जाता था।

मालथौन से प्यारी लाल मिश्रा

सदन के डिप्टी प्रेसिडेंट डॉ हरिसिंह गौर के साथ सागर के मालथौन गांव के प्यारी लाल मिश्र भी थे। प्यारी लाल मिश्र इसके पहले छिंदवाड़ा नगर पालिका के अध्यक्ष भी रहे थे। वही बिलासपुर से कुंज बिहारी लाल अग्निहोत्री, मोहम्मद एहसान खान और रघुवीर सिन्हा सदन में चुनकर आए थे। उस समय संसद दिल्ली विधानसभा में चलती थी। इसके अलावा एक सदन कुछ समय के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल से भी चलती थी। भारत में दो सदनों वाली संसद का गठन पहली बार हुआ था जिसके चलते कुछ ज्यादा सफलता ही मिली थी। लेकिन सदन के नेता हरिसिंह गौर थे। बाद में उनके अंग्रेजी शासकों से कई बार मतभेद हुआ। कई विवाद हुए, साथ ही कांग्रेस पार्टी के असहयोग के चलते सदन दो साल में ही समाप्त हो गई। इसके बाद फिर 2023 में फिर चुनाव हुए। इन चुनावों में तब सीटें बढ़ कर 145 हो गईं। इस आम चुनाव का कांग्रेस ने बहिष्कार किया, लेकिन मोतीलाल नेहरू ने चुनाव लड़ कर बहुमत प्राप्त किया और सदन के नेता मोतीलाल नेहरू चुने गए।

हरिसिंह गौर बने कुलपति

हरिसिंह गौर ने दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान देते हुए वहां पर कुलपति के पद को स्वीकार कर लिया। हरिसिंह गौर ने उन दिनों महिलाओं तथा अन्य प्रगतिशील कानूनों के पक्ष में अंग्रेजों के सामने जबरदस्त पैरवी करते हुए ना केवल न्यायालयों में अपनी बात रखी बल्कि संसद में रहकर उनके लिए कानून बनवाए। भारतीय राजनीति में हरिसिंह गौर एक अंडर-रिपोर्टेड व्यक्तित्व हैं जिनके बारे में आधुनिक भारत में बहुत कम लिखा और कहा गया है।

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