झाबुआ में मजदूरों का पलायन जारी: दर्जनों गांव रातों रात खाली, 5 साल की नींद के बाद नेताओं को हुई मतदान प्रतिशत की चिंता

Lok Sabha Chunav 2024: 5 साल की नींद के बाद जागे नेताजी, दर्जनों गांव रातो-रात हो गए खाली, अब हो रही है मतदान प्रतिशत की चिंता

झाबुआ में मजदूरों का पलायन जारी: दर्जनों गांव रातों रात खाली, 5 साल की नींद के बाद नेताओं को हुई मतदान प्रतिशत की चिंता

रिपोर्ट-श्रवण मालवीय 

Lok Sabha Chunav 2024: आदिवासी अंचल में इन दिनों पलायन का दौर जारी है. लोकसभा चुनाव को महज अब आठ दिन का समय बचा है. वहीं पिछले चरणों में हुए कम मतदान प्रतिशत से सत्ताधारी पक्ष असमंजस की स्थति में है. प्रधानमंत्री मोदी लगातार मतदान प्रतिशत बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं. आदिवासी अंचल में इसकी एक वजह निकलकर सामने आई है. झाबुआ में चुनाव के ठीक पहले लोग पलायन कर रहे हैं. यह लोग गुजरात राजस्थान, समेत देश के दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए परिवार सहित निकल पड़ते हैं.

मतदान कम होने से सत्ताधारी दल को हुआ नुकसान

देश में जब-जब कम मतदान हुआ उसका सीधा नुकसान सत्ताधारी दल को हुआ है. झाबुआ जिले में ज्यादातर वोटर ग्रामीण क्षेत्रों में बसता है. वहीं चुनाव से ठीक आठ दिन पूर्व ग्रामीणों का पलायन पर जाना सत्ताधारी दल को भारी पड़ सकता है. अब जिला प्रशासन ने मजदूरी पर गए लोगो से संपर्क के लिए कॉल सेंटर बनाया है. परंतु ग्रामीण जिस तरह से बड़ी संख्या में जा रहे हैं, उससे जाहिर है कि वे मतदान करने वापस  नहीं आएंगे.

बेरोजगारी पलायन की मुख्य वजह

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पलायन शब्द अब झाबुआ जिले का पर्यायवाची बन चुका है. लंबे समय से झाबुआ अंचल के लोग बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं. अब यहां के हजारों ग्रामीणों ने अपने आशियानों पर या तो ताला लगा दिया है या परिवार के बुजुर्ग सदस्यों के सुपर्द कर छोटे-छोटे बच्चों समेत बाहर निकल गए हैं. अपने वतन से हजारों सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर, तपती धूप में कड़ी मेहनत करना, खुले आसमान के नीचे सोना, निर्माणाधीन इमारत के एक और किसी सड़े-गले हिस्से में छोटी सी रसोई बनाकर वहीं अपना खाना खा लेना उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया है.

सरकारी योजनाओं में नाम लेकिन नहीं मिलता फायदा

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस, मजदूर दिवस, बाल दिवस जैसे दिन में ग्रामीण मजदूरों, इन मजदूरों (Migrant Workers Jhabua) में शामिल गर्भवती महिलाओं, और पढ़ाई की उम्र में हाथों में भारी भरकम ईंटें उठा कर काम रहे छोटे-छोटे बच्चों की याद हम सभी को आ जाती है. जमीनी हकीकत यही है कि इनका नाम कई सरकारी योजनाओं में कब जुड़ जाता है, इन ग्रामीणों को पता ही नहीं चलता है. इनके नाम पर दूसरे व्यक्तियों को लाभ मिल जाता है. यह विकास की बात कर रहे विभिन्न राजनीतिक दलों पर सवालिया निशान खड़ा कर रहा है.

दूसरे राज्यों में मिल रही ज्यादा मजदूरी

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पलायन पर जाने का मुख्य उद्देश्य मजदूरी की राशि का अंतर है. जिले में रहकर जहां मजदूर पूरे दिन मजदूरी करने के बाद हाथ में 250 से 300 रुपए पाते हैं. वहीं दूसरे राज्यों में काम करने पर 500 से लेकर 700 रुपए मजदूरी मिलती है. मजदूरी का यह बड़ा अंतर ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को पलायन पर जाने के प्रति आकर्षित करता है. इसके अलावा जिले में बढ़ती बेरोजगारी भी पलायन पर जाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल है.

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 चुनाव के समय नेताओं को आती है इनकी  याद

राजनीतिक दल पांच साल की नींद के बाद इनके पास पहुंचते हैं. ऐसा प्रतीत होता है नेताओं को यह ग्रामीण केवल वोटर दिखाई देते हैं. उनकी समस्याओं से उनको कोई सरोकार नहीं है. हर बार नेताओं को 5 साल बाद ही उनकी याद आती है. इसका प्रमाण यह है कि चुनाव के दिनों में कई राजनीतिक पार्टियों के पदाधिकारी पलायन पर गए इन मजदूर को मतदान करवाने के लिए जिले में लाने के लिए और वापस छुड़वाने के लिए पूरी व्यवस्था, खर्चा भी उठाते है.

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