Khudiram Bose: मां भारती के वो वीर सपूत, जो देश के लिए महज 18 साल की उम्र मे फांसी के फंदे पर झूल गया

Khudiram Bose

नई दिल्ली। देश के इतिहास में ऐसे कई वीर थे जिन्होंने भारत माता को आजाद कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। लेकिन इन वीरों में से एक नाम ऐसा है जिन्होंने बहुत ही कम उम्र में देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर दी थी। जिस उम्र में हर युवा अपने करियर और आने वाले भविष्य को लेकर परेशान रहता है, उस उम्र में देश का एक वीर सपूत सूली पर चढ़ गया था। आज ही के दिन यानी 11 अगस्त को महज 18 साल की उम्र में खुदीराम बोस (Khudiram Bose) को साल 1908 में फांसी दी गई थी। आइए आज जानते हैं उनकी जिंदगी के कुछ खास पहलू…

16 साल की उम्र में आंदोलने में कूद पड़े

खुदीराम बोस का जन्म बंगाल में मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में 3 दिसंबर, 1889 को हुआ था। बोस जब छोटे थे तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। ऐसे में उनकी बड़ी बहन ने उनका लालन-पालन किया। बोस बचपन से ही क्रांतिकारी थी। महज 16 साल की उम्र में उन्होंने सत्येन बोस के नेतृत्व में अपने क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत की थी और देश को आजादी दिलाने कि लिए आंदोलन में कूद पड़े थे।

आजादी के लिए बीच में ही छोड़ दी पढ़ाई

खुदीराम बोस के बारे में कहा जाता है कि वे स्कूल के दिनों से ही राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने लग गए थे। वे अंग्रजों के खिलाफ होने वाले जलसे जुलूसों में शामिल होते और उनके खिलाफ नारेबाजी करते थे। बोस ने आंदोलन के चक्कर में 9वीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी और जंग-ए-आजादी में पूरी तरह से कूद पड़े। स्कूल छोड़ेन के बाद वे रिवोल्यूशनरी पार्टी से जुड़ गए और वंदे मातरम् पैंफलेट वितरित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

क्रूर अधिकारी को मारने के जिम्मा मिला था

6 दिसंबर 1907 को बंगाल के नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर किए गए बम विस्फोट की घटना में बोस शामिल थे। इसके बाद एक क्रूर अंग्रेज अधिकारी किंग्सफोर्ड को मारने की जिम्मेदारी भी उन्हें दी गई और इस काम में उन्हें प्रफ्फुल चंद्र चाकी का साथ मिला। दोनों पहले बिहार के मुजफ्फरपुर पहुंचे और फिर एक दिन मौका देखकर किंग्सफोर्ड की बग्घी में बम फेंक दिया। हालांकि तब दुर्भाग्य से उस बग्घी में किंग्सफोर्ड मौजूद नहीं था। इस हमले में किसी दूसरे अंग्रेज अधिकारी और पत्नी की मौत हो गई थी। हमले के बाद अंग्रेज पुलिस खुदीराम बोस और प्रफुल्ल कुमार चाकी के पीछे लग गयी और आखिरकार उन्हें वैनी रेलवे स्टेशन पर घेर लिया गया।

चाकी ने खुद ही अपनी शहादत दे दी थी

पुलिस से घिरा देख वहीं पर प्रफुल्ल कुमार चाकी ने खुद को गोली मारकर अपनी शहादत दे दी, जबकि खुदीराम बोस को पुलिस ने पकड़ लिया। बाद में मजिस्ट्रेट ने उन्हें फांसी पर लटकाने का आदेश सुनाया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार खुदीराम बोस को जब फांसी के तख्ते पर ले जाया जा रहा था, तो वे एक शेर की बच्चे की तरह निर्भीक होकर और हाथ में गीता लेकर तख्ते की तरफ बढ़े थे।

लोगों ने शहादत के बाद कई दिनों तक शोक मनाया था

जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी उम्र 18 साल 8 महीने और 8 दिन थी। 11 अगस्त 1908 को उन्हें मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दी गई थी। जब बोस शहीद हुए थे उसके बाद विद्यार्थियों और अन्य लोगों ने शोक मनाया था और कई दिन तक स्कूल, कॉलेज सभी बन्द रहे थे। खुदीराम बोस के शहीद होने के बाद नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे थे जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।

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