Karwa Chauth 2021: जानें करवा चौथ पर किस चीज का है महत्व, कैसे होंगी मां करवा प्रसन्न

karva chouth

नई दिल्ली। सुहागनों का मुख्य Karwa Chauth 2021 त्योहार करवा चौथ 24 अक्टूबर को मनाया जाएगा। ज्योतिषियों की मानें तो इस बार करवा चौथ खास रहने वाला है। विशेष नक्षत्र में पड़ रहा करवा चौथ सुहागिनों को कुछ खास देकर जाएगा। करवाचौथ को करक चतुर्थी और दशरथ चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित राम गोविन्द शास्त्री के अनुसार इस दिन चंद्र रोहिणी नक्षत्र में उदित होंगे। इस नक्षत्र में चंद्र के उदय होने से वे विशेष फल देते हैं।

24 अक्टूबर को चौथ तिथि में होगा चंद्र का उदय

पंडित व ज्योतिषाचार्य पंडित रामगोविन्द शास्त्री के अनुसार इस वर्ष करवा चौथ 24 अक्टूबर को ही मनाया जाएगा। इस दिन चौथ तिथि में शाम को 7:51 मिनिट पर चंद्र का उदय होगा। इस दिन का व्रत वैसे तो निर्जला रहा जाता है। पर ​इसे जितना सहन कर सकें। उतनी शक्ति अनुसार किया जाना चाहिए।

करवा चौथ व्रत मुहूर्त :

चतुर्थी तिथि की शुरुआत –

24 अक्टूबर रविवार को प्रात: 03:01 मिनट पर

चतुर्थी तिथि समाप्त —

25 अक्टूबर 2021 को प्रात: 05:43 मिनट पर

पूजा मुहूर्त —

24 अक्टूबर को शाम 05:43 मिनट से 06:59 मिनट तक रहेगा

चंद्रोदय का समय —

24 अक्टूबर को शाम 7:51 मिनट पर चंद्रोदय बताया जा रहा है।

करवा चौथ की पूजा सामग्री —

करवा चौथ की पूजा करने के लिए दीपक, कपास की बाती, तेल का दीपक, घेरा, फूल, मिठाई, रोली, अगरबत्ती, एक मिट्टी का बर्तन, रोल, धूप, सिंदूर, चंदन, हल्दी, शहद, चीनी, दूध, पानी, दही, घी और कपूर की आवश्यकता होती है।

क्या होती है सरगी?
व्रत के पहले सास की ओर से बहु को भोर से पहले खाने का जो भोजन दिया जाता है। उसे सरगी कहते हैं। इस सरगी में पका हुआ भोजन, सूखे मेवे, मिठाई, दीया, मटर, दही आदि शामिल हैं।

शकर के पुओं का है महत्व
करवा चौथ के दिन शक्कर से बने करवे की पूजन का काफी महत्व है। चार पूड़ी और चार लड्डू तीन अलग जगह लेकर एक हिस्से को पानी वाले कलश के ऊपर रखें। दो हिस्से अलग—अलग करवों पर रखकर तीसरा पल्लू में रखते हैं। करवा माता का चित्र दीवाल पर चिपका कर पूजा आरंभ करें। अब मां देवी के सामने घी का दीपक जलाकर कथा पढ़ें। पूजा के बाद साड़ी के पल्ले में रखे प्रसाद और करवे पर रखे प्रसाद को अपने पुत्र या पति को खिलाएं। वह कलश पर रखे प्रसाद को गाय को खिला दें। पानी से भरे कलश को पूजा स्थल पर रहने दें। रात को चंद्रमा दिखने पर इसी लोटे के पानी से चांद को अर्घ्य देंने के बाद व्रत का पारण करें।

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