kareel Mela : यहां भगवान श्रीराम की नहीं बल्कि केवल माता सीता की होती है पूजा

भोपाल। यह तो हम सभी जानते हैं कि भगवान श्रीराम और माता सीता के लव-कुश दो पुत्र थे। kareel Mela पर आइए हम आपके उनके जन्म का इतिहास बताते हैं।  इस संबंध में हम गौरव महसूस करते हैं कि उनकी जन्मस्थली हमारे मध्यप्रदेश में ही है। जी हां हम जिस वाल्मीकि आश्रम की बात कर रहे हैं वो है मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले स्थित मुंगावली तहसील के करीला गांव में। उनका जन्म इसी वाल्मीकि आश्रम में हुआ था।  इसे ही करीला माता का मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में केवल माता सीता की प्रतिमा है और केवल उन्ही की पूजा की जाती है।  मेले में मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा और अन्य प्रदेशों से लाखों लोग पहुंचते हैं।

मेले को लेकर असमंजस्य की स्थिति
पिछले वर्ष मेले का आयोजन किया गया है। प्रतिवर्ष करीब 15 लाख से अधिक लोग मेले में पहुंचते हैं। हालांकि इस वर्ष भी इस कोरोना के कारण मेले को लेकर असमंजस्य की स्थिति बनी हुई है। 2 अप्रैल यानि रंगपंचमी को लगने वाले इस मेले को लेकर प्रशासन की ओर से इसके स्थगन के बारे मेंं कोई आदेश जारी नहीं किए गए हैं।
लव-कुश का हुआ था जन्म
ऐसी मान्यता ​है भगवान श्रीराम के द्वारा माता सीता के परित्याग करने के बाद माता सीता करीला में ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में आ गई थीं। जहां उन्होंने लव-कुश को जन्म दिया। इस अवसर पर करीला में खुशियां मनाई गईं और अप्सराओं का नृत्य हुआ। रंगपंचमी पर यह उत्सव मनाया गया। उस समय से ही यहां राई नृत्य का यह सिलसिला चलता आ रहा है। ऐसी मान्यता है कि लोगों की मन्नत पूरी हो जाती है तो लोग यहां राई नृत्य करवाते हैं।

करीब 1000 से ज्यादा नृत्यांगनाएं आती हैं यहां
करीब 8 से 10 किमी के क्षेत्र में इस मेले का आयोजन होता है। जहां करीब 100 से अधिक डीजे आते हैं और 1000 से अधिक राई नृत्यांगनाएं आती हैं।

रंगपंचमी पर लगता है मेला

ऐसी मान्यता है कि रंगपंचमी के दिन लव-कुश का जन्म हुआ था। तभी से रंगपंचमी पर लव-कुश के जन्म की खुशियां मनाई जाती है। इस अवसर पर यहां बहुत बड़ा मेला लगता है, साथ ही बधाई गीत गाए जाते हैं। सबसे बड़ी खासियत मानी जाने वाला बुंदेलखंड का पारंपरिक राई नृत्य श्रद्धाभाव से कराया जाता है।
माना जाता है कि लव-कुश के जन्म के समय बधाई गीत गाए गए थे और स्वर्ग से अप्सराओं ने उतरकर नृत्य किया था। इस मौके पर बेड़िया जाति की हजारों नृत्यांगनाओं ने भी राई नृत्य किया था। यह प्रथा तभी से चली आ रही है।

मन्नत पूरी करने पर कराते हैं राई नृत्य

ऐसी मान्यता है कि मंदिर में अपनी मन्नत पूरी हो जाने पर भक्त पूरी श्रृद्धा भक्ति के साथ राई और बधाई नृत्य कराते हैें।

मिल जाती हैं खुशियां
जिन दंपतियों की संतान नही हैं अगर वे यहां सच्चे मन से मन्नत मांगे तो उनकी मन्नत पूरी हो जाती है। तो उन्हें यहां बेड़नियों द्वारा राई नचवानी पड़ती है।

एक कथा और प्रचलित है
वैसे तो इस स्थान के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं उनमें से 200 वर्ष पुरानी एक कथा यह भी है जो यहां के स्थानीय लोगों के बीच प्र​चलित है कि विदिशा जिले के ग्राम दीपनाखेड़ा के महंत तपसी महाराज स्वप्न आया कि करीला ग्राम में टीले पर एक आश्रम है जिसमें माता जानकी और लवकुश रहे थे। वाल्मीकिजी का यह आश्रम वीरान पड़ा है इसे जागृत करो। अगले दिन महाराज ने करीला पहाड़ी पर वह वीरान आश्रम देखा। उन्होेंने आश्रम की सफाई की और साथ ही स्थानीय लोग भी उनके साथ जुट गए और आश्रम सुंदर लगने लगा।
भभूति का उपयोग खेत में
यहां माता सीता के चरणों की भभूति को भक्त चमत्कारी भी मानते हैं। मान्यता है कि ये भभूति कीटाणु नाशक के रूप में इस्तेमाल की जाती है। इसे फसलों में डालने से सभी प्रकार के कीटाणु नष्ट होते हैं।

बुंदेली राई नृत्य सांस्कृतिक विरासत में किया शामिल
करीला मंदिर स्थित मां जानकी मंदिर में किया बेड़निया जाती द्वारा किए जाने वाले इस राई नृत्य काेे देश की सांस्कृतिक विरासत में शामिल किया है। ताकि बुंदेली राई नृत्यांगनाओं काे सम्मान के साथ—साथ इस कला को प्रोत्साहन भी मिले। रंगपंचमी से तीन दिन तक चलने वाले इस मेले में दूर-दूर से नृत्यांगनाएं आती हैं।

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