Jwala Devi Temple: इस मंदिर में वर्षों से पृथ्वी के गर्भ से निकल रहीं हैं 9 ज्वालाएं, हैरान करने वाले हैं इसके रहस्य

Jwala Devi Temple: इस मंदिर में वर्षों से पृथ्वी के गर्भ से निकल रहीं हैं 9 ज्वालाएं, हैरान करने वाले हैं इसके रहस्य

Jwala Devi Temple: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में स्थित ज्वालादेवी का मंदिर अपनी ज्वालाओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। इस मंदिर की रोचक बात यह है कि यहां कोई मूर्ति नहीं है बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रहीं 9 ज्वालाओं की पूजा की जाती है। यह मंदिर कांगड़ा घाटी के दक्षिण में 30 किमी की दूरी पर स्थित है। यह मां सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है। आइए जानते हैं इस मंदिर की ज्वाला से जुड़े रहस्यों और मान्यताओं के बारे में।

जोता वाली का मंदिर
मां भगवती के 51 शक्तिपीठों में से एक ज्वालामुखी मंदिर को जोता वाली का मंदिर भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, ज्वालादेवी शक्तिपीठ पर माता सती की जीभ गिरी थी। मां इस मंदिर में ज्वाला के रूप में विराजमान हैं। इनके अलावा भगवान शिव भी उन्मत भैरव के रूप में विराजमान हैं।

पृथ्वी के गर्भ से 9 अलग-अलग जगह से ज्वालाएं निकल रही हैं। इसके ऊपर ही मंदिर बनाया गया है। इस मंदिर में मूर्ति नहीं बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रहीं 9 ज्वालाओं की पूजा की जाती है। चमत्कार की बात ये है कि, ये ज्वाला कहां से निकल रही हैं आज तक कोई नहीं जानता।

ज्वालाएं मानी जाती हैं मां के 9 स्वरूपों का प्रतीक
लोग इन ज्वालाओं को मां के 9 स्वरूपों का प्रतीक मानते हैं। इनमें से सबसे बड़ी ज्वाला को ज्वाला माता कहा जाता है। बाकी की 8 ज्वालाओं के रूप में मां अन्नपूर्णा, मां विध्यवासिनी, मां चण्डी देवी, मां महालक्ष्मी, मां अम्बिका देवी, मां हिंगलाज माता, देवी मां सरस्वती और मां अंजी देवी हैं।

मंदिर में जमीन से निकलती इस ऊर्जा का इस्तेमाल करने के लिए ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी, लेकिन वे इस भूगर्भ से निकलती ज्वाला का पता नहीं लगा पाए कि यह इसके निकलने का कारण क्या है।

अकबर ने भी की थी ज्वाला को बुझाने की कोशिश
वहीं अकबर द ग्रेट ने भी इस ज्योत को बुझाने का प्रयास किया था लेकिन वो भी नाकाम रहा। इतना ही नहीं आजादी के बाद भूगर्भ वैज्ञानिक भी इस क्षेत्र में तंबू गाड़ कर बैठे, मगर वह भी इस ज्वाला की जड़ तक नहीं पहुंच पाए।

राजा भूमि चंद ने इस मंदिर का प्राथमिक निर्माण करवाया था। बाद में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह और हिमाचल के राजा संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर का पूर्ण निमार्ण कराया। इसी वजह से इस मंदिर में हिंदुओं और सिखों की साझी आस्था है।

मंदिर तक कैसे जाएं
वायु मार्ग- मंदिर जाने के लिए नजदीकी हवाई अड्डा गगल में है जो मंदिर से 43.6 किमी की दूरी पर स्थित है। यहां से मंदिर तक जाने के लिए कार या बस सुविधा उपलब्ध है।

रेल मार्ग- रेल मार्ग से जाने वाले यात्री पठानकोट से चलने वाली स्पेशल ट्रेन की सहायता से मरांदा होते हुए पालमपुर आ सकते है। पालमपुर से मंदिर तक जाने के लिए बस व कार सुविधा उपलब्ध है।

सड़क मार्ग- पठानकोट, दिल्ली, शिमला जैसे प्रमुख शहरो से मंदिर तक जाने के लिए बस या कार की सुविधा है। यात्री अपने निजी वाहनो या फिर हिमाचल प्रदेश टूरिज्म विभाग की बस से भी यहां तक पहुंच सकते हैं।

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