Pride Month : जून को प्राइड मंथ कहते है, जानिए क्या है LGBTQI

Pride Month : जून को प्राइड मंथ कहते है, जानिए क्या है LGBTQI

LGBTQI प्राइड मंथ अमेरिका में हुए स्टोनवॉल दंगों की याद में मनाया जाता है। यह दंगे एलजीबीटी अधिकारों को लेकर हुए जून 1969 में हुए थे। कालांतर में मार्टिन और स्कूनमेकर ने प्राइड शब्द को लोकप्रिय किया। यह एलजीबीटी अधिकारों के लिए वोकल होने का महीना होता है। इन शब्दों को सरलता से समझने के लिए हमनें बंसल अस्पताल के मनोरोग एवं साइकोसेक्सुअल एक्सपर्ट डॉ सत्यकांत त्रिवेदी से बात की और जाना

LGBTQI में L का मतबल

L – लेस्बियन। यानी एक स्त्री/लडक़ी लिंग का समान लिंग के प्रति आकर्षण। इसमें दोनों पार्टनर स्त्री/लड़की ही होती हैं।इसका आधार दूसरी स्त्री के प्रति यौनाकर्षण होता है।

G का मतलब ?

G – ‘गे’। जब एक पुरूष को एक और पुरूष से लैंगिक आसक्ति हो तो उन्हें ‘गे’ कहते हैं।

B का मतबल

B – ‘बाईसेक्सुअल’। जब किसी पुरूष या लडक़ी/महिला को पुरुष और महिला दोनों से ही लैंगिक आसक्ति हो और यौन संबंध भी बनाते हों तो उन्हें ‘बाईसेक्सुअल’ कहते हैं। पुरूष और स्त्री दोनों ही ‘बाईसेक्सुअल’ हो सकते हैं।

T का मतबल

T- मतलब। ‘ट्रांसजेंडर’। वह व्यक्ति जिनका शरीर पैदा होते समय प्राकृतिक जेंडर (असाइंड जेंडर)और वह बड़ा होकर स्वयं को मन से एकदम उलट महसूस करने लगे।

Q  का क्या मतलब है ?

Q का मतलब है ‘क्वीयर’। ऐसे इंसान जो न अपनी पहचान तय कर पाए हैं न ही लैंगिक चाहत। मतलब ये लोग खुद को न पुरूष ,महिला या ‘ट्रांसजेंडर’ मानते हैं और न ही ‘लेस्बियन’, ‘गे’ या ‘बाईसेक्सुअल’, उन्हें ‘क्वीयर’ कहते हैं। ‘क्वीयर’ के ‘Q’ को ‘क्वेश्चनिंग’ भी समझा जा सकता है ,जिनके मन में अपनी पहचान और शारीरिक चाहत पर अभी भी बहुत प्रश्न हैं।

I- इंटरसेक्स

ये वे लोग होते हैं जिनके जन्म के समय यह तय नहीं हो पाता कि वे लड़का हैं या लड़की तब उन्हें इंटर-सेक्स कहा जाता है। उम्र बढ़ने पर होने पर जब बच्चे को जैसी फीलिंग आती है वह उसी हिसाब से स्वयं को पुरूष, महिला या ट्रांसडेंडर तीनों में से कुछ भी मान लेता है।

डॉ सत्यकांत त्रिवेदी (Psychiatrist in Bhopal) कहते हैं कि कलंक के भाव एवं जागरूकता के अभाव के चलते LQBTQI समुदाय के लोगों में डिप्रेशन ,एंग्जायटी यहां तक स्वयं को नुकसान पहुंचाने का खतरा आम जनसंख्या से कई गुना ज्यादा होता है।कई बार अभिभावक मेरे पास आते हैं वे कहते हैं आप दवा देकर इन्हें ठीक कर दें,जबकि यह कोई बीमारी नहीं है।विकास में भिन्नता होना मानसिक रोग नहीं होता। अगर किसी भी व्यक्ति के मन में अपने सेक्सुअल ओरिएंटेशन को लेकर असमंजस हो तो मनोचिकित्सक की सहायता अवश्य लेनी चाहिए।

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