International Women’s Day 2021: ये तीन कानून जिसके बारे में हर महिला को जानना चाहिए

international women's day 2021

नई दिल्ली। भारत में ही नहीं, दुनिया भर में महिलाओं के लिए न्याय अभी भी दूर की कौड़ी लगता है। लेकिन कई महिलाओें ने इसके लिए खुब लड़ाईयां लड़ी हैं। सरकार ने भी कई ऐसे कानून बनाए हैं जिससे महिलाएं अपने अधिकारों की रक्षा कर सकती हैं। ऐसे में ये जानना जरूरी हो जाता है कि वो कौन से कानून हैं जिसे हर स्त्री को जानना चाहिए। हम आपको 3 प्रमुख कानूनों के बारे में बताएंगे, जिससे महिलाएं अपने अधिकारों और सुरक्षा के प्रति सजग और जागरूक हो सकती हैं।

1. डाउरी प्रॉहिबिशन एक्ट 1961

भारत में दहेज प्रथा कोई नई बात नहीं है। ये काफी पुरानी प्रथा है और न जाने इस प्रथा ने कितनी बेटियों की जानें ली है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि इसके लिए 1961 में ही कानून बनाया गया था। जिसके तहत दहेज लेना या देना, दोनों ही अपराध की श्रेणी में रखा गया। इसके लिए पांच वर्ष की कैद और 15 हजार रूपये तक का जुर्माना होता था। शुरूआत में इसके प्रावधान भी बहुत कठोर थे। जो कोई शिकायत करता उसके तुरंत बाद ही गिरफ्तारी हो जाती थी। साथ ही इसमें जमानत का भी कोई प्रवधान नहीं था।

कानून को वापस लेने की उठी थी मांग

लेकिन इस कानून का इतना ज्यादा मिस यूज होने लगा कि 1980 के दशक तक न्यायालयों मे इस कानून को वापस लेने की मांग उठने लगी। कोर्ट ने भी इन याचिकाओं पर माना कि कानून का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। हालांकि कोर्ट ने इसे वापस लेने से मना कर दिया और इसके कुछ प्रावधानों में ढील दी गई। जैसे तत्काल गिरफ्तारी और जमानती अपराध जैसे नियम को वापस ले लिया गया। कोर्ट ने साफतौर पर कहा कि कानून का कुछ लोग दुरूपयोग कर रहे हैं, लेकिन इसका ये अर्थ नहीं है हम कानून को गैरजरूरी समझे। इस कानून ने हजारों स्त्रियों के लिए न्याय का दरवाजा खोला है, हम इस दरवाजे को बंद नहीं कर सकते हैं।

2. पॉश- द सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ विमेन एट वर्कप्लेस (प्रिवेंश, प्रोहिबिशन एंड रीड्रेसल बेनिफिट एक्ट, 2013)

यह कानून वैसी महिलाओं के लिए जो कामकाजी हैं। कार्यस्थल पर किसी भी प्रकार की यौन हिंसा और प्रताड़ना से कानूनी सुरक्षा देने के लिए इस कानून को बनाया गया था। 3 सिंतबर 2012 को यह लोकसभा और 26 फरवरी 2013 को इसे राज्यसभा से पारित किया गया था। इसके तहत कोई भी सरकारी या गैरसरकारी दफ्तर आते हैं जहां 10 से अधिक कर्मचारी और महिलाएं काम करती हैं। इन कंपनियों को अपने यहां महिलाओं की सुरक्षा के लिए पॉश कमेटी बनाना अनिवार्य होता है।

विशाखा गाइडलाइंस के लिए कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था

दरअसल, इस कानून को विशाखा गाइडलाइंस से आगे का कमद माना जाता है। जिसे साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने भंवरी देवी केस के बाद स्वत: संज्ञान लेते हुए जारी किया था। भंवरी देवी उस वक्त एक एनजीओ में काम करती थीं। जहां उनके साथ रेप हुआ था। इसके बाद कोर्ट ने उन लाखों महिलाओं की सुरक्षा के लिए जो अपने घरों से निकलकर काम करती थीं, उनके लिए विशाखा गाइडलाइंस को जारी किया था। आज कामकाजी महिलाएं जिस भी दफ्तर में काम करती हैं वहां उनकी सुरक्षा को सुनिश्चित करना संस्थान की जिम्मेदारी है। आज अगर कोई उनके साथ अनुचित व्यवहार करता है तो वो पॉश कमेटी के सामने उसकी शिकायत कर सकती हैं।

3. प्रोटेक्शन ऑफ विमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वॉयलेंस 2005

महिलाओं को सबसे ज्यादा इस कानून की जरूरत थी। जिसे 26 अक्टूबर, 2005 को भारत में लागू किया गया। इस कानून का उद्देश्य हर प्रकार से महिलाएओं की रक्षा करना था। मालूम हो कि कई रिपोर्ट में ये दावा किया गया था कि भारत में 70 फीसदी महिलाएं घरों के अंदर घरेलू हिंसा की शिकार हैं और इनमें से महज 10 फीसद महिलाएं ही अपनी शिकायत दर्ज कराती हैं। 2006 से पहले तक भारत में कोई ऐसा कानून भी नहीं था जिसके तहत महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकायत कर सकती थीं। लेकिन आज अगर कोई महिला घरेलू हिंसा की शिकार हैं तो वो बेहिचक इस कानून के तहत पुलिस के पास शिकायत कर सकती हैं।

कानून की ये है खास बात

इस कानून के तहत सबसे खास बात ये है कि ये जरूरी नहीं कि जो पीड़ित है वो ही इसकी शिकायत करे, यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि कोई महिला घरेलू हिंसा की शिकार हो रही है, तो वो भी जाकर पुलिस के पास शिकायत दर्ज करवा सकता है और इस पर पुलिस को एक्शन लेना पड़ता है।

 

Share This

0 Comments

Leave a Comment

Login

Welcome! Login in to your account

Remember me Lost your password?

Lost Password