उज्जैन के 5 वकीलों को 7 साल तक की सजा: दबंगई ऐसी कि पत्रकार को पीटा, जज हटवाने आवेदन लगाए, इंदौर ट्रांसफर करना पड़ा केस

इंदौर की जिला अदालत ने उज्जैन कोर्ट परिसर में पत्रकार पर हुए जानलेवा हमले के मामले में पांच वकीलों दोषी ठहराया। यह फैसला ऐतिहासिक है क्योंकि यह केस 15 साल पुराना है और वकीलों को एक साथ सजा सुनाया गया।

उज्जैन के 5 वकीलों को 7 साल तक की सजा: दबंगई ऐसी कि पत्रकार को पीटा, जज हटवाने आवेदन लगाए, इंदौर ट्रांसफर करना पड़ा केस

indore District Court Judgement: मध्यप्रदेश में इंदौर जिला अदालत (indore District Court) ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पांच वकीलों (Lawyers) को पत्रकार पर हमले के मामले में दोषी ठहराया है। यह मामला 2009 में उज्जैन कोर्ट परिसर में वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम पटेल पर हुए हमले से जुड़ा है, जिसमें अब 15 साल बाद न्याय मिला है। यह देश का पहला मामला है जिसमें पांच वकीलों को एक साथ धारा 307/34 के तहत दोषी ठहराया गया है। अब कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए 4 को 7 साल की और 90 साल के बुजुर्ग वकील को 3 साल की सजा सुनाई है।

देश में पहली बार 5 वकील एक साथ दोषी करार!

इंदौर जिला कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्रीकृष्ण डागलिया ने 2009 में उज्जैन कोर्ट परिसर में वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम पटेल पर हुए जानलेवा हमले के मामले में पांच वकीलों को दोषी करार दिया है। अदालत ने चार वकील धर्मेंद्र शर्मा, शैलेंद्र शर्मा, भवेंद्र शर्मा और पुरुषोत्तम राय को 7-7 साल के सश्रम कारावास और 90 साल के वकील सुरेंद्र शर्मा को तीन साल कार सामान्य कारावास की सजा सुनाई। साथ ही सभी पर 10-10 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया।

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15 साल बाद आया ऐतिहासिक निर्णय

यह मामला करीब 15 साल तक अदालत में चला। इसमें कई बार सुनवाई हुई और लंबी कानूनी बहसों के बाद कोर्ट ने इसे हत्या के प्रयास (धारा 307) और आपराधिक साझा इरादा (धारा 34) के तहत गंभीर अपराध मानते हुए सभी पांचों को दोषी ठहराया।

पत्रकार को गवाही से रोकने की साजिश

आरोपियों ने वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम पटेल पर उस समय हमला किया था जब वे अदालत में एक केस की गवाही देने जा रहे थे। यह हमला उन्हें चुप कराने और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से किया गया था।

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देश में पहला ऐसा मामला

यह भारत का पहला मामला है जिसमें पांच पेशेवर वकीलों को एक साथ हत्या के प्रयास जैसे गंभीर अपराध में दोषी ठहराया गया है। यह निर्णय न केवल कानूनी व्यवस्था की दृढ़ता को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि कानून के सामने सब बराबर हैं।

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