“ मोबाइल फोन पर सत्संग सुनने बैठता हूं पर मन प्रपंच में उलझ जाता है”, सुनिए प्रेमानन्द जी ने क्या कहा?

“सत्संग सुनने बैठे, लेकिन मन मोबाइल की नोटिफिकेशन में खो गया…”
आज के समय में यही हमारी सबसे बड़ी साधना है — मन को टिकाना!
हम भगवान के शब्द सुनने बैठे हैं, लेकिन हमारे अंगूठे सोशल मीडिया स्क्रोल कर रहे हैं।
लेकिन सत्संग में जो बात है, वो स्थिर है, शांत है, गहरी है…
इसलिए मन को वो धीमी लगती है, बोर लगती है।
मन भागेगा ही, उसे रोकना नहीं… बार-बार वापस लाना ही ध्यान है।
जैसे बच्चा खेलते-खेलते घर लौटता है,
वैसे ही मन भी लौटेगा, अगर आप धैर्य रखें।

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