MP News: चुनावी योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, मध्यप्रदेश सरकार को नोटिस जारी, पढ़ें पूरी खबर

सुप्रीम कोर्ट ने आज मुफ्त की रेवड़ी बांटने पर दायर याचिका पर सुनवाई की है। सुप्रीम कोर्ट ने मप्र समेत केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, राजस्थान को नोटिस जारी जबाव मांगा है।

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भोपाल। सुप्रीम कोर्ट ने आज मुफ्त की रेवड़ी बांटने पर दायर याचिका पर सुनवाई की है। सुप्रीम कोर्ट ने मप्र समेत केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, राजस्थान को नोटिस जारी जबाव मांगा है। उच्च्तम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने इस संबंध 4 सप्ताह के भीतर जबाव दाखिल करने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट सभी याचिकाएं को एकसाथ जोड़ा

सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में कई जनहित याचिकाएं दायर की गई थी। कोर्ट ने सभी याचिकाओं को एक साथ जोड़ दिया है और इंन्हीं याचिकाओं आज सुनवाई हुई है। सभी याचिकाओं की सुनवाई एक साथ की जाएगी।

अश्विनी उपाध्याय ने लगाई थी याचिका

पिछले साल जनवरी में भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की थी। इस याचिका में अश्विनी उपाध्याय ने कहा था कि राजनीतिक पार्टियां अपने निजी हितों के लिए मदताओं को पैसे देने और उपहार देने जैसे वादे कर रहे हैं, इस पर रोक लगनी चाहिए साथ ही जो भी पार्टी इस तरह की घोषणाएं करें उनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए।

केंद्र सरकार ने कही थी ये बात

केंद्र सरकार ने अश्विनी से सहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट से फ्रीबीज की परिभाषा तय करने की अपील की। केंद्र ने कहा कि अगर फ्रीबीज का बंटना जारी रहा तो ये देश को 'भविष्य की आर्थिक आपदा' की ओर ले जाएगा।

फ्रीबीज़ की परिभाषा आरबीआई ने यह तय की

इस मसले पर केंद्र की मोदी ने भी जनहित याचिका पर सहमति देते हुए कोर्ट से फ्रीबीज यानी की भारतीय रिज़र्व बैंक की वर्ष 2022 की एक रिपोर्ट में फ्रीबीज़ को ‘‘एक लोक कल्याणकारी उपाय जो निःशुल्क प्रदान किया जाता है’’ के रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें कहा गया है कि फ्रीबीज़ स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे व्यापक एवं दीर्घकालिक लाभ प्रदान करने वाली सार्वजनिक/ मेरिट वस्तुओं से भिन्न हैं।

11 अगस्त को भी हुई थी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त को इसी मसले पर सुनवाई की थी जिसमें चुनाव आयोग ने कोर्ट से कहा था कि राजनीतिक पार्टियां कौनसी योजनाएं बनाती है उसमें चुनाव आयोग हस्तक्षेप नहीं कर सकता है यह चुनाव आयोग के कार्यक्षेत्र के बाहर है।

चुनाव आयोग इस दलों का नीतिगत फैसला बताया था। अगर कोर्ट में दखल देता है तो यह नियम विरुध्द माना जाएगा इसलिए इसमें कोर्ट ही तय करे कि मुक्त की योजनाएं कौनसी है कौन नहीं फिर हमें इस लागू कर इसका पालन करेंगे।

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