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हाइलाइट्स
ग्वालियर लोकसभा सीट पहले जनसंघ और फिर बीजेपी का गढ़
महल के कैंडिडेट को छोड़कर अधिकतर बीजेपी प्रत्याशी जीता
ग्वालियर लोकसभा में शिवपुरी की दो विधानसभा भी शामिल
Gwalior Lok Sabha Seat: देश में 18वीं लोकसभा चुनाव का महासंग्राम चल रहा है। दो चरणों का चुनाव हो चुका है।
मध्यप्रदेश में 29 सीटों में से अब तक 12 लोकसभा सीटों पर चुनाव हो चुका है। अब तीसरे चरण में 9 सीटों पर चुनाव होना है।
इसमें प्रदेश की महत्वपूर्ण लोकसभा सीट ग्वालियर भी शामिल है। हम यहां आज ग्वालियर लोकसभा सीट का एनालिसिस कर रहे हैं।
महल के कैंडिडेट का हमेशा मिला जनता का साथ
यूं तो ग्वालियर लोकसभा सीट (Gwalior Lok Sabha Seat) बीजेपी का गढ़ है, लेकिन जब भी महल का चुनाव में दखल हुआ है तो जनता महल के साथ गई है।
हालांकि बीच- बीच में जनता ने कांग्रेस को भी मौका दिया है।
विधानसभा चुनाव हारे दोनों प्रमुख प्रत्याशी आमने- सामने
इस बार यानी लोकसभा चुनाव 2024 में ग्वालियर में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने नए कैंडिडेट्स पर दांव लगाया है।
दोनों ही ऐसे कैंडिडेट्स हैं, जो पिछला विधानसभा चुनाव हार गए हैं। मतलब विधानसभा चुनाव हारे उम्मीदवारों से बीजेपी और कांग्रेस ने बड़ा चुनाव जीतने की उम्मीद लगाई है।
यहां बीजेपी से भारत सिंह कुशवाह और कांग्रेस से प्रवीण पाठक उम्मीदवार हैं।
कौन कहां से हारा
ग्वालियर से बीजेपी उम्मीदवार भारत सिंह कुशवाह पिछले विधानसभा चुनाव में ग्वालियर ग्रामीण सीट से चुनाव हार गए हैं।
उन्हें कांग्रेस के साहिब सिंह गुर्जर ने मात दी। इसी तरह कांग्रेस के प्रवीण पाठक ग्वालियर दक्षिण विधानसभा से चुनाव हारे हैं। उन्हें बीजेपी के नारायण सिंह कुशवाह ने हराया।
नरेंद्र सिंह तोमर के समर्थक हैं भारत सिंह
भारत सिंह कुशवाह पूर्व मंत्री रहे हैं। उन्हें पूर्व केंद्रीय मंत्री और मौजूदा मध्यप्रदेश विधानसभा के स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर का कट्टर समर्थक माना जाता है।
भारत सिंह को टिकट दिलाने में नरेंद्र सिंह तोमर की अहम भूमिका बताई जाती है।
बीजेपी प्रत्याशी भारत सिंह का मजबूत पक्ष
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यूं तो बीजेपी प्रत्याशी भारत सिंह का खुद का क्या बजूद है? यह पिछले विधानसभा चुनाव का परिणाम दर्शा (पराजय हाथ लगी थी ) रहा है,
पर यहां भारत सिंह पहली बार लोकसभा चुनाव मैदान में उतरे हैं।
पेशे से किसान भारत सिंह के पीछे पूरी पार्टी और उसका एक बड़ा चेहरा है। यहां जानते हैं उनके लिए मजबूत पक्ष क्या-क्या हैं।
- मोदी, मंदिर और राष्ट्रवाद
बीजेपी कैंडिडेट्स भारत सिंह को पीएम नरेंद्र मोदी की पॉपुलर्टी, अयोध्या राम मंदिर की स्थापना और पार्टी की राष्ट्रवाद की नीति से प्रभावित लोगों के वोट बड़ी संख्या में मिलेंगे।
भारत सिंह भी प्रचार में मोदी के नाम पर ही वोट मांग रहे हैं। राम मंदिर और राष्ट्रवाद की बातें प्रचार का सशक्त माध्यम बनी हुई हैं।
- ग्वालियर लोकसभा सीट बीजेपी का गढ़
ग्वालियर लोकसभा सीट (Gwalior Lok Sabha Seat) मूलत: बीजेपी का गढ़ है। यहां से महल का कैंडिडेट जरूर अपवाद स्वरूप जीतता रहा है।
उसमें चाहें स्वर्गीय विजया राजे सिंधिया (1962) रही हों या फिर माधवराव सिंधिया (1984, 1989, 1991, 1996,1998 )।
ग्वालियर की जनता ने पार्टी (बीजेपी ) की तुलना में महल को तरजीह दी है। हालांकि, इस सीट पर 2007 से बीजेपी का कब्जा है।
यानी लगातार 17 साल से ग्वालियर में भाजपा के सांसद हैं।
आजाद भारत में ग्वालियर सीट (Gwalior Lok Sabha Seat) पर अब तक 19 लोकसभा चुनाव हुए।
जिसमें सिर्फ दो बार कांग्रेस के उम्मीदवार ही मैदान ( महल के कैंडिडेट को छोड़कर ) मार पाए हैं। 1957 में सूरज प्रसाद और 2004 में रामसेवक सिंह बाबूजी।
- भारत सिंह को संगठन और सरकार का सपोर्ट
बीजेपी प्रत्याशी भारत सिंह को पार्टी सगठन और दोनों सरकार ( केंद्र और राज्य सरकार ) का पूरा सपोर्ट है। इसके अलावा ग्वालियर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की फौज की भी बड़ी मदद मिल रही है। संघ का ग्वालियर में अच्छा वजूद है।
- सिंधिया, महल और नरेंद्र सिंह तोमर का सपोर्ट
बीजेपी प्रत्याशी भारत सिंह को पार्टी के साथ- साथ केंद्रीय उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ महल का भी समर्थन मिल रहा है। इसके अलावा भारत सिंह एक तरह से पूर्व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के समर्थक हैं। ऐसे में क्षत्रिय वोट भारत सिंह के खाते में जा सकते हैं।
- कुशवाह और ओबीसी वोटों का मिलेगा फायदा
ग्वालियर सीट (Gwalior Lok Sabha Seat) पर करीब 4 लाख के आसपास कुशवाह और ओबीसी वोटर्स हैं। जिसका भारत सिंह को सीधा लाभ मिल सकता है। ये मुकाबले में जीत-हार के अंतर को जरूर कम करेंगे।
बीजेपी कैंडिडेटस भारत सिंह की चुनौती
- सीमित क्षेत्र में पहचान
भारत की मुख्य चुनौती शहर में ज्यादा चर्चित नहीं होना है। वे ग्वालियर ग्रामीण से विधायक रहे हैं।
प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे हैं। उनकी एक सीमित क्षेत्र में ही पहचान है। शिवराज कैबिनेट में मंत्री रहते हुए भी उनका शहर से मेल-जोल भी उतना नहीं रहा, जिससे बड़ी पहचान बनती।
- भारत सिंह को समाज के नेता का समर्थन न मिलना
बीजेपी प्रत्याशी भारत सिंह को कुशवाह समाज के बड़े नेता और प्रदेश के मंत्री नारायण सिंह कुशवाह का खुलकर समर्थन नहीं मिलने की चर्चा हो रही है।
बताते हैं अभी तक मंत्री नारायण सिंह, भारत सिंह की सभाओं में दिखाई नहीं दिए हैं। हालांकि, ग्वालियर में चुनाव 7 मई को होना है। सो, हो सकता है अंतिम दौर के प्रचार में सामने आ जाएं।
- चकरामपुर हत्या कांड के कारण क्षत्रिय नाराज
17 नवबंर 23 को विधानसभा चुनाव की वोटिंग के बाद कुशवाह और क्षत्रियों में विवाद हुआ था।
जिसमें क्षत्रिय समाज के चार लोगों की हत्या कर दी गई थी। नरवर तहसील का चकरामपुर गांव कुशवाह बहुल क्षेत्र है।
इस हत्याकांड के घाव अभी भरे नहीं हैं। जिसका खामियाजा बीजेपी प्रत्याशी भारत सिंह को भुगतना पड़ सकता है।
कांग्रेस प्रत्याशी प्रवीण पाठक का मजबूत पक्ष
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कांग्रेस प्रत्याशी प्रवीण पाठक ग्रामीण के साथ शहरी परिवेश में भी सक्रिय रूप से जुड़े हैं। 2018 में विधायक बनाने के बाद प्रवीण ने अपनी पहचान में जबरदस्त इजाफा किया है।
समाज, विशेष तौर से ब्राह्मण समाज में उनका अच्छा दखल है। वे युवा होने के साथ-साथ, शिक्षित हैं।
- ग्वालियर-चंबल में अलग सियासी बयार
ग्वालियर-चंबल में हमेशा सियासी बयार अलग ही बहती है और जब महल से सीधे जुड़ा कोई कैंडिडेट मैदान में नहीं होता है
तो जनता कैंडिडेट के व्यवहार से लेकर उसकी पूरी पर्सनालिटी का आंकलन करने के बाद अपना सांसद चुनती आई है।
इस लिहाज से कांग्रेस के प्रवीण पाठक का पक्ष काफी मजबूत दिखाई देता है। जो वोटर्स को प्रभावित करेगा। अ
ब वह संख्या में तबदील होता है या नहीं, यह 4 जून (परिणाम के दिन ) को ही पता चलेगा।
- राहुल गांधी का ओबीसी प्रेम
राहुल गांधी का ओबीसी प्रेम कांग्रेस प्रत्याशी प्रवीण पाठक को फायदा दिला सकता है।
यानी ओबीसी वर्ग कांग्रेस के वोट बढ़ा सकता है। इसके साथ ही राहुल गांधी का जातिगत जनगणना का मुद्दा भी यहां कांग्रेस के वोटों में इजाफा कर सकता है।
- गुना में केपी यादव का टिकट कटना प्रवीण के लिए फायदे का सौदा
गुना-शिवपुरी लोकसभा सीट पर मौजूदा सांसद केपी यादव का टिकट कटने से यादव समाज के लोग नाराज बताए जा रहे हैं।
जिसका असर ग्वालियर में भी पड़ सकता है। गुना में इस बार केपी यादव की जगह बीजेपी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को टिकट दिया है।
इसका प्रतिकूल असर ग्वालियर (Gwalior Lok Sabha Seat) में बताया जा रहा है।
ग्वालियर में यादव समाज के लोग इस बदलाव का जवाब वोट के रूप में दे सकते हैं। जिसका लाभ कांग्रेस प्रत्याशी प्रवीण के लिए फायदे का सौदा हो सकता है।
- आंकड़ों में प्रवीण का पलड़ा हल्का नहीं
ग्वालियर लोकसभा सीट (Gwalior Lok Sabha Seat) में ग्वालियर की 6 और शिवपुरी की दो विधानसभा सीटें ( पोहरी और करेरा ) शामिल हैं।
इन 8 सीटों में चार पर कांग्रेस का कब्जा है। इस लिहाज से देखें तो यहां प्रवीण का पलड़ा हल्का नहीं कहा जा सकता है।
- शहर की मेयर और विधायक कांग्रेसी
ग्वालियर शहर की मेयर शोभा सिकरवार हैं और विधायक (ग्वालियर पूर्व) सतीश सिंह सिकरवार हैं। दोनों कांग्रेसी हैं। जिसका लाभ कांग्रेस प्रत्याशी प्रवीण पाठक को मिलने की पूरी संभावना है।
- ब्राह्मण और क्षत्रियों का मिलेगा समर्थन
प्रवीण पाठक को ब्राह्मण और क्षत्रिय वोटों का भी समर्थन मिलने के आसार बन रहे हैं।
ग्वालियर में करीब 3 लाख ब्राह्मण वोट हैं। साथ ही दो लाख के करीब क्षत्रिय हैं। इनका साथ कांग्रेस के प्रवीण पाठक को मिलने की संभावना जताई जा रही है।
कांग्रेस कैंडिडेट प्रवीण पाठक की चुनौती
कांग्रेस कैंडिडेट प्रवीण पाठक के प्रचार के लिए अब तक कोई बड़ा पार्टी नेता ग्वालियर में प्रचार के लिए नहीं आया है। जिससे आमजन और कांग्रेस में आस्था रखने वालों का मन भी डंवाडोल है। उनके सामने बड़ा सवाल है कि कांग्रेस को लीड कौन करेगा?
- बीएसपी कैंडिडेट कंसाना देंगे चुनौती
कांग्रेस के नेता रहे कल्याण सिंह कंसाना बीएसपी के टिकट से मैदान में हैं। जिससे प्रवीण पाठक को चुनौती मिल रही है।
कल्याण एक समय राहुल गांधी की कोर टीम में रहे हैं। उनके भाई केदार सिंह कंसाना, अभी कांग्रेस में ही हैं, पर प्रवीण का कितना समर्थन करेंगे? समझा जा सकता है।
कल्याण कंसाना बीएसपी के वोटों के अलावा कांग्रेस के वोटों में ही सेंध लगाएंगे।
- रामसेवक सिंह बाबूजी भी नाराज
कल्याण सिंह कंसाना के बाद पूर्व सांसद रामसेवक सिंह बाबूजी भी नाराज चल रहे हैं।
बताते हैं वे भी ग्वालियर सीट से कांग्रेस से टिकट के दावेदारों में शामिल थे। इन दोनों गुर्जर नेताओं की नाराजगी से कांग्रेस के परंपरागत वोटों का ध्रुवीकरण होना तय माना जा रहा है।
मोदी लहर कितनी तेज, इस पर निर्भर करेगा ग्वालियर का चुनाव
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वरिष्ठ पत्रकार देवश्री माली का मानना है कि इस बार बीजेपी के कार्यकर्ताओं में उत्साह कम दिखाई दे रहा है।
हमेशा ही बीजेपी को शहर के वोटों से जीत मिलती रही है। अब तक ऐसा नहीं लग रहा है कि यहां भी देश का बड़ा चुनाव (Gwalior Lok Sabha Seat) हो रहा है।
दो चरणों के चुनाव में वोट प्रतिशत का घटना और उसमें भी महिलाओं की वोटिंग कम होना, बीजेपी के लिए अनुकूल तो नहीं कहा जा सकता है।
अब सिर्फ यही देखना है कि यहां मोदी की लहर कितनी तेज चलती है या जातियों के समीकरण प्रभावी रहते हैं।
यदि मोदी की लहर 2019 लोकसभा चुनाव से कमजोर रही तो मुकाबला कांटे को होगा।
वहीं एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप भटनाकर का कहना है कि ग्वालियर में बीजेपी और कांग्रेस में मुकाबला टक्कर का है। यहां बीजेपी कैंडिडेट को वोट मोदी के नाम पर ही मिलेंगे। इस बार भी जीत-हार का अंतर कम ही रहने की संभावना है।
आठ विधानभाओं में से 4 पर बीजेपी और 4 पर कांग्रेस का कब्जा
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ग्वालियर लोकसभा सीट (Gwalior lok sabha Seat) में आठ विधानसभा सीटें आती हैं।
जिसमें में से 4 पर बीजेपी और इतने पर ही कांग्रेस का कब्जा है। इस हिसाब से आंकड़े बराबरी के दिखाई दे रहे हैं।
ग्वालियर लोकसभा के कब, कौन चुना गया
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ग्वालिर लोकसभा सीट: जातिगत समीकरण
- अनुसूचित जाति- 4 लाख
- क्षत्रिय - 2 लाख
- यादव- 2 लाख
- अल्पसंख्यक- 1.70 लाख
- ब्राह्मण - 3 लाख
- गुर्जर- 2.2 लाख
- आदिवासी- 1.85 लाख
- रावत - 1.60 लाख
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2024 में मतदाताओं की स्थिति
- कुल मतदाता- 21,40, 297
- पुरुष मतदाता - 12,87,660
- महिला मतदाता- 11,61,717
- 18- 19 साल के मतदाता- 35,056
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