Ganagaur vrat 15 April 2021 , जाने संपूर्ण विधि व महत्व

ganngour poojan

भोपाल। तीजा और करवा चौथ के तरह ही ganagaur vrat 15 april 2021 पति की दीर्घायु के लिए हिन्दु धर्म के अनुसार गणगौर व्रत का भी बहुत महत्व है। इस वर्ष यह व्रत 15 अप्रैल यानी कल मनाया जाएगा। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को पड़ने वाले इस व्रत पर विवाहित महिलायें अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।
इस व्रत का चलन राजस्थान एवं सीमावर्ती मध्य प्रदेश में अधिक है। इस दिन कुवांरी लड़कियां एवं विवाहित महिलायें गण यानि शिवजी और गौर यानी मां पार्वती की पूजा करती हैं। इस दिन पूजन के समय मिट्टी गणगौर बनाकर उस पर महावर, सिंदूर और चूड़ी चढ़ाई जाती है। चंदन, अक्षत, धूपबत्ती, दीप, नैवेद्य से पूजन करके भोग लगाया जाता है। विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु के लिए और कुंवारी कन्याएं मनभावन पति की प्राप्ति के लिए इस व्रत को करती हैं।

गणगौर व्रत पूजन विधि

मिट्टी के गणगौर बनाकर उन पर उनको वस्त्र व सुहाग की वस्तुएं भेंट करें। चन्दन, अक्षत, धूप, दीप, दूर्बा व पुष्प से उनकी पूजा-अर्चना करें। एक बड़ी थाली में चांदी का छल्ला और सुपारी रखकर उसमें जल, दूध-दही, हल्दी, कुमकुम घोलकर सुहागजल तैयार किया जाता है। दोनों हाथों में दूर्बा लेकर इस जल से पहले गणगौर को छींटे लगाएं फिर अपने ऊपर सुहाग के प्रतीक के तौर पर इस जल को छिड़कें। चूरमे का भोग लगाकर गणगौर माता की कहानी सुनें। गणगौर महिलाओं का त्यौहार माना जाता है इसलिए गणगौर पर चढ़ाया हुआ प्रसाद पुरुषों को नहीं दिया जाता। उसके बाद माता को सिंदूर लगाकर सुहाग लें।

गणगौर व्रत कथा
एक समय की बात है। शिवजी, मां पार्वती एवं नारद जी के साथ भ्रमण पर निकले। चलते-चलते एक गांव में पहुंचे। उस दिन चैत्र शुक्ल तृतीया थी। उनका आना सुनकर गांव की निर्धन स्त्रियां उनके स्वागत के लिए थालियों में हल्दी व अक्षत लेकर पूजन करने पहुंची। पार्वती जी ने उनके पूजा भाव को समझकर सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। वे अटल सुहाग प्राप्त कर लौटी।

थोड़ी देर बाद धनी वर्ग की स्त्रियां अनेक प्रकार के पकवान सोने चांदी के थालो में सजाकर सोलह श्रृंगार करके शिव और पार्वती के सामने पहुंची। इन स्त्रियों को देखकर भगवान शंकर ने पार्वती से कहा तुमने सारा सुहाग रस तो निर्धन वर्ग की स्त्रियों को ही दे दिया। अब इन्हें क्या दोगी। पार्वती जी बोली प्राणनाथ। उन स्त्रियों को ऊपरी पदार्थों से निर्मित रस दिया गया है।

इसलिए उनका सुहाग धोती से रहेगा किंतु मैं इन धनी वर्ग की स्त्रियों को अपनी अंगुली चीरकर रक्त का सुहाग रख दूंगी। इससे वो मेरे समान सौभाग्यवती हो जाएंगी। जब इन स्त्रियों ने शिव पार्वती पूजन समाप्त कर लिया तब पार्वती जी ने अपनी अंगुली चीर कर उसके रक्त को उनके ऊपर छिड़क दिया जिस पर जैसे छींटे पड़े उसने वैसा ही सुहाग पा लिया।

पार्वती जी ने कहा तुम सब वस्त्र आभूषणों का परित्याग कर, माया मोह से रहित होओ और तन, मन, धन से पति की सेवा करो। तुम्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होगी। इसके बाद पार्वती जी भगवान शंकर से आज्ञा लेकर नदी में स्नान करने चली गई। स्नान करने के पश्चात बालू की शिव जी की मूर्ति बनाकर उन्होंने पूजन किया। भोग लगाया तथा प्रदक्षिणा करके दो कणों का प्रसाद ग्रहण कर मस्तक पर टीका लगाया। उसी समय उस पार्थिव लिंग से शिवजी प्रकट हुए तथा पार्वती को वरदान दिया आज के दिन जो स्त्री मेरा पूजन और तुम्हारा व्रत करेगी उसका पति चिरंजीवी रहेगा तथा मोक्ष को प्राप्त होगा। भगवान शिव यह वरदान देकर अंतर्धान हो गए। ये सब करते-करते पार्वती जी को काफी समय लग गया।

पार्वती जी नदी के तट से चलकर उस स्थान पर आईं जहां पर भगवान शंकर व नारद जी को छोड़कर गई थी। शिवजी ने विलंब से आने का कारण पूछा तो इस पर पार्वती जी बोली मेरे भाई भावज नदी किनारे मिल गए थे। उन्होंने मुझसे दूध भात खाने तथा ठहरने का आग्रह किय। इसी कारण से आने में देर हो गई। ऐसा जानकर अंतर्यामी भगवान शंकर भी दूध-भात खाने के लालच में नदी तट की ओर चल दिए। पार्वती जी ने मौन भाव से भगवान शिवजी का ही ध्यान करके प्रार्थना की, भगवान आप अपनी इस अनन्य दासी की लाज रखिए। प्रार्थनी करती हुई पार्वती उनके पीछे-पीछे चलने लगी। उन्हें दूर नदी तट पर माया का महल दिखाई दिया। वहां महल के अंदर शिवजी के साले तथा सलहज ने शिव पार्वती का स्वागत किया। पार्वती रूठकर अकेले ही चल दी वे दो दिन वहां रहे।
तीसरे दिन पार्वती ने शिवजी से चलने के लिए कहा तो वे चलने को तैयार न हुए। तब पार्वती रूठकर अकेले ही चल दी। शिवजी को भी पार्वती के साथ चलना पड़ा। नारदजी भी साथ चल दिए। चलते-चलते भगवान शंकर बोले मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूं। माला लाने के लिए पार्वती तैयार हुई तो शंकरजी ने पार्वती को न भेजकर नारदजी को भेजा। वहां पहुंचने पर नारदजी को कोई महल दिखाई नहीं दिया। दूर-दूर तक जंगल था। सहसा बिजली कौंधी। नारदजी को शिवजी की माला एक पेड़ पर टंगी दिखाई दी। नारदजी ने माला उतारी और शिवजी के पास पहुंचकर यात्रा का कष्ट बताने लगे। शिवजी हंसकर बोले यह सब पार्वती की ही लीला है। इस पर पार्वती बोलीं मैं किस योग्य हूं। यह सब तो आपकी ही कृपा है। ऐसा जानकर महर्षि नारद ने माता पार्वती तथा उनके पतिव्रत प्रभाव से उत्पन्न घटना की प्रशंसा की। जहां तक उनके पूजन की बात को छिपाने का प्रश्न है वह भी उचित ही जान पड़ता है क्योंकि पूजा छिपाकर ही करनी चाहिए। चूंकि पार्वती ने इस व्रत को छिपाकर किया था उसी परंपरा के अनुसार आज भी पूजन के अवसर पर पुरुष उपस्थित नहीं रहते हैं।

गणगौर 2021 पूजन शुभ मुहूर्त –
तृतीया तिथि प्रारम्भ – 14 अप्रैल 2021 रात 12:47 पी एम से
तृतीया तिथि समाप्त – 15 अप्रैल 2021 दोपहर 03:27 पी एम तक

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