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हाइलाइट्स
विधेयक के पक्ष में 780 वोट पड़े
फ्रांस के लिए सोमवार का दिन ऐतिहासिक
फ्रांस में 1975 से है अबॉर्शन का कानूनी अधिकार
France Abortion Right: फ्रांस सोमवार (4 मार्च) को गर्भपात को संवैधानिक अधिकार देने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है। फ्रांस के सांसदों ने 1958 के संविधान में बदलाव कर महिलाओं को गर्भपात से जुड़े मामले में पूरी तरह से फैसला लेने की आजादी दे दी है। इस संविधान संसोधन के पक्ष में 780 और विरोध में महज 72 वोट पड़े।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस बिल पर गर्व बताते हुए कहा है कि ये पूरी दुनिया को एक संदेश देगा। हालांकि, गर्भपात विरोधी समूहों ने इस संवैधानिक बदलाव की पुरजोर आलोचना की है। वहीं, गर्भपात अधिकार के समर्थकों ने पेरिस में जुटकर इस फैसले की तारीफ की।
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बताया दुनिया का नया युग (France Abortion Right)
कानून पारित होने के बाद, जिसने महिलाओं को गर्भपात कराने की अनुमति दी, प्रधान मंत्री ने कहा कि यह एक नए समय की शुरुआत है। कुछ लोगों को यह कानून पसंद नहीं आया, लेकिन वे ऐसा होने से नहीं रोक सके।
विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने चुनावी उद्द्रेश्यों के लिए संविधान का उपयोग किया है। उनका कहना है कि यह संशोधन गलत नहीं है, लेकिन ये अनावश्यक है।
फ्रांस में लंबे समय से चल रही थी अबॉर्शन को अधिकार देने की मांग
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फ़्रांस में, महिला समूहों और नियमित नागरिकों सहित बहुत से लोग चाहते थे कि महिलाओं को गर्भपात कराने का विकल्प चुनने का अधिकार मिले। फ़्रांस में अधिकांश लोग, लगभग 85%, इस विचार से सहमत थे।
फ्रांस में महिलाओं को नया अधिकार दिया गया। इसे फ़्रांस में नियमों में बदलाव कहा जाता है जिसे संशोधन कहा जाता है। यह 25वीं बार है जब उन्होंने इस तरह का बदलाव किया है, लेकिन 2008 के बाद यह पहली बार है।
फ्रांस ने किया फैसले का स्वागत

फ्रांसीसी संविधान में गर्भपात को शामिल करने के कदम को कई लोग स्वागत कर रहे हैं। महिलाओं के अधिकारों के प्रति संवेदनशील संस्था फोंडेशन डेस फेम्स की कार्यकर्ता ऐनी-सेसिल मेलफर्ट ने कह यह दुनिया के लिए महत्वपूर्ण संदेश है। इन भावनाओं ने हमें आज भर दिया है और वास्तविकता में हमें ऊर्जावान बनाई है।
हालांकि वेटिकन ने गर्भपात के खिलाफ अपना विरोध जताया है, और उन्होंने यह कहा है कि मानव जीवन लेने का कोई अधिकार नहीं हो सकता है।
संसद में हुआ संसोधन का विरोध
संसद में इस संसोधन का विरोध कर रहे नेताओं ने फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों पर सियासी फायदे के लिए संविधान का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।
आलोचकों का कहना है कि इस संविधान संसोधन अपने आप में गलत है और गैर-जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति मैक्रों इसके जरिए वामपंथी विचारों को बढ़ावा दे रहे हैं।
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