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Footwear prices Hike: ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS) ने मार्केट में बिकने वाले सभी जूतों-चप्पलों (फुटवियर) के लिए नए क्वालिटी स्टैंडर्ड जारी कर दिए हैं।
बीआईएस के नए स्टैंडर्ड के आधार पर बने फुटवियर ज्यादा मजबूत और टिकाऊ तो बनेंगे ही, लेकिन इसके साथ ही फुटवियर की रेटों में भी बढ़ोतरी होगी।
ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड के नए मानकों के लागू होते ही 1 अगस्त से जूते, सैंडल और चप्पल (फुटवियर) महंगे हो सकते हैं।
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इन स्टैंडर्ड में जूतों की क्वालिटी के साथ-साथ इस्तेमाल होने वाली सामग्री और सुरक्षा जैसे कई पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया गया है।
ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS) ने यह साफ कर दिया है कि नए नियम का पालन न करने वाली कंपनियों पर कड़ी कार्रवाई भी हो सकती है।
ज्यादा चलेंगे आपके फुटवियर
अब आपके फुटवियर से आपको फिसलन नहीं होगी और इसमें क्रैक भी नहीं आएगा। इसी के साथ-साथ आपके फुटवियर के ऊपर का सोल भी ज्यादा लचीला होगा।
2-3 महीने चलने वाला फुटवियर 7-8 महीने चलेगा। अगर आपको खराब फुटवियर की वजह से होने वाले घुटनों में दर्द होने की शिकायत है तो ये भी कम हो सकती है।
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मीडिया रिपोर्ट की मानें तो इन सुविधाओं के बदले ग्राहक को पहले की तुलना में 5% तक की अधिक कीमत भी चुकानी पड़ सकती है, क्योंकि बीआइएस सर्टिफिकेट लेने के लिए निर्माताओं को कई गुणवत्ता मानकों का पालन करना होगा और इससे उनकी लागत बढ़ सकती है।
छोटे फुटवियर निर्माताओं को राहत
मीडिया रिपोर्ट की मानें तो अभी सालाना 50 करोड़ रुपए से कम का कारोबार करने वाले फुटवियर निर्माताओं को ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (BIS) के इस नियम से बाहर रखा गया है।
50 करोड़ रुपए से ज्यादा के सालाना टर्नओवर वाले फुटवियर निर्माताओं के पुराने स्टॉक पर यह नियम लागू नहीं होगा।
वे अपने पुराने स्टॉक की पूरी जानकारी BIS की साइट पर अपलोड करेंगे। अभी सरकार ने जून 2025 तक पुराने माल को बेचने की अनुमति दी है।
क्या होगा BIS सर्टिफिकेट से
इस सर्टिफिकेट से फुटवियर में यूज होने वाले कच्चे माल जैसे कि रेक्सिन, इनसोल, लाइनिंग की कमेकिल जांच सही तरीके से करनी होगी।
इसी के साथ ऊपरी भाग के मेटेरियल की टीयर स्ट्रेंथ और बेहतर लचीलापन की जांच में पास होना होगा।
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इस सर्टिफिकेट को लागू करने के पीछे सरकार का उद्देश्य है कि उपभोक्ताओं को एक निश्चित गुणवत्ता का माल मिले और भारतीय फुटवियर उत्पादों की वैश्विक बाजार में भी ब्रांडिंग हो सके।
इससे निर्यात भी बढ़ेगा और जूते-चप्पलों की क्वालिटी पहले से बेहतर हो जाएगी। अगर भारतीय फुटवियर की क्वालिटी बेहतर होगी तो इनका नाम दुनिया में अच्छा होगा।
BIS के लाइसेंस में है लाखों का खर्चा
फुटवियर बनाने वाली कंपनियों और निर्माताओं की मानें तो BIS नियम के पालन के लिए उन्हें 6-8 लाइसेंस लेने पड़ते हैं। इन प्रत्येक लाइसेंस पर 2-3 लाख रुपए खर्च होते हैं।
फुटवियर सेक्टर में सैकड़ों से अधिक निर्माता 50 करोड़ से कम टर्नओवर वाले हैं। अभी इन पर ये नियम लागू नहीं होगा।
इन सभी निर्माताओं पर यह नियम लागू होने के बाद ही पूर्ण रूप से गुणवत्ता वाले फुटवियर मार्केट में बिकेंगे। वाणिज्य मंत्रालय की मानें तो कुछ समय बाद छोटे निर्माताओं पर भी ये नियम लागू कर दिया जाएगा।
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