सोशल मीडिया में EVM पर छिड़ी बहस: वोट किसी को दो पर जीतता कोई और है, क्या नेहरू के PM बनने के समय भी ऐसा ही कुछ हुआ था?

EVM Controversy: सरदार वल्लभ भाई पटेल को 13 और जवाहरलाल नेहरू को एक भी वोट नहीं मिला, फिर भी नेहरू बने प्रधानमंत्री

सोशल मीडिया में EVM पर छिड़ी बहस: वोट किसी को दो पर जीतता कोई और है, क्या नेहरू के PM बनने के समय भी ऐसा ही कुछ हुआ था?

Story of Becoming First PM of India: चुनाव का मौसम है और इस मौसम में EVM का जिक्र न हो ऐसा भला कैसे हो सकता है।

ईवीएम (EVM Controversy) को लेकर विपक्ष हमेशा आरोप लगाता रहा है कि मतदाता वोट किसी को देते हैं और जीतता कोई और है।

ईवीएम (EVM Hacking) की इस राजनीति में पड़े बिना हम आपके लिए खबर कोई और ही लाए हैं।

EVM-Controversy-Post

विपक्ष के EVM पर आरोपों का जवाब बीजेपी समर्थक जिस तरह से सोशल मीडिया पर दे रहे हैं, उससे एक नई बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया पर इन दिनों के एक पोस्ट वायरल हो रही है।

आइये आपको बताते हैं कि उस पोस्ट का EVM और देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू (India's first Prime Minister Pt. Jawaharlal Nehru) से क्या कनेक्शन है।

2019 में भी हुई थी ऐसी ही पोस्ट वायरल

चुनावी मौसम में EVM Controversy को लेकर विपक्ष के आरोप सामने आते रहते हैं।

2024 की तरह ही 2019 में भी चुनाव (Lok Sabha Elections) के समय सोशल मीडिया में इसी तरह की पोस्ट सुर्खियों में आई थी।

EVM-Hacking

विपक्ष के ईवीएम (EVM Controversy) पर आरोपों को लेकर बीजेपी (BJP) समर्थक की एक पोस्ट सोशल मीडिया पर खासी चर्चा में है।

ये पोस्ट कोई बीजेपी पदाधिकारी और नेता नहीं बल्कि उनके समर्थक डाल रहे हैं। पोस्ट में लिखा है कि ईवीएम में छेड़छाड़ (EVM Controversy) तो 1947 में हुई थी।

जब पटेल को 14 वोट मिले और नेहरू को 1 वोट मिला फिर भी PM नेहरू। जाहिर सी बात है 1947 में EVM नहीं थी, ये पोस्ट ईवीएम (EVM Controversy) पर उठाए गए सवाल पर कटाक्ष है।

पर सवाल ये है कि क्या वाकई में 1947 में ऐसा हुआ था जब 14 वोट पाकर भी सरदार पटेल प्रधानमंत्री नहीं बन सके और नेहरू एक वोट पाकर भी देश के पहले प्रधानमंत्री बन गए।

आइये...सिलसिलेवार समझने की कोशिश करते हैं...

देश आजादी के एक साल पहले लिखी गई थी पटकथा

भारत देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था, लेकिन इससे करीब एक साल पहले ही ब्रिटेन ने सत्ता भारत के हाथों में दे दी थी।

देश को चलाने के लिए अंतरिम सरकार का गठन होना था। तब तय हुआ कि कांग्रेस का अध्यक्ष ही प्रधानमंत्री बनेगा।

https://twitter.com/BansalNewsMPCG/status/1794663838606127480

जैसे ही ये बात पार्टी में फैली, उस वक्त छह साल से कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर काबिज मौलाना अबुल कलाम आज़ाद समझ गए कि अब उनके जाने का वक्त हो गया है और महात्मा गांधी के कहने पर उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया।

पीएम के लिए पटेल और नेहरू थे उम्मीदवार

मौलाना के पद छोड़ने के बाद अब देश के सामने प्रधानमंत्री पद के दो दावेदार थे। पहला सरदार वल्लभ भाई पटेल और दूसरे पं. जवाहरलाल नेहरू।

उस दौर के अधिकतर कांग्रेसी नेता चाहते थे कि देश की कमान सरदार वल्लभ भाई पटेल (Sardar Vallabh Bhai Patel) के हाथों में सौंपी जाए।

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क्योंकि वे अड़ियल जिन्ना से अच्छा मोलभाव कर सकते थे। देश के अंतरिम सरकार में प्रधानमंत्री का चुनाव आम चुनाव (General Election) से नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी के अंदर ही होना था।

पर अधिकांश तो सरदार पटेल के समर्थन में थे तो फिर नेहरू कैसे पीएम बन गए, आइये अब इसे समझते हैं।

सरदार पटेल को 12 और नेहरू को नहीं मिला एक भी वोट

बात 29 अप्रैल 1946 में कांग्रेस कार्यसमिति (Congress Working Committee) की बैठक की है। इसमें कांग्रेस के अध्यक्ष के साथ-साथ देश को प्रधानमंत्री भी मिलने वाला था।

परपंरा के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव प्रांतीय कांग्रेस कमेटियां करती थीं और 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने सरदार पटेल का नाम प्रस्तावित किया था।

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बची हुई तीन कमेटियों ने आचार्य जेबी कृपलानी और पट्टाभी सीतारमैया का नाम प्रस्तावित किया था।

किसी भी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने अध्यक्ष पद के लिए नेहरू का नाम प्रस्तावित नहीं किया था, पर फिर भी पीएम नेहरू ही बने।

बापू के इस पत्र से समझें नेहरू के पीएम बनने की कहानी

कलेक्टट वर्क्स खंड 90 पेज 315 पर इसका जिक्र मिलता है।

20 अप्रैल 1946 को महात्मा गांधी बापू ने उस दौर के कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना को पत्र लिखकर कहा कि वे एक वक्तव्य जारी करें कि अब 'वह अध्‍यक्ष नहीं बने रहना चाहते हैं।

Jawaharlal-Nehru

अगर इस बार मुझसे राय मांगी गई तो मैं जवाहरलाल को पसंद करूंगा, इसके कई कारण हैं. उनका मैं ज़िक्र नहीं करना चाहता।'

इस पत्र के बाद पूरे कांग्रेस में खबर फैल गई कि गांधी नेहरू को प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं।

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गांधी की मंशा के विपरीत नेहरू को वोट नहीं मिलने पर ये किया

सारी कमेटियां अच्छे तरह जानती थी कि गांधी ने‌हरू को अध्यक्ष बनाना चाहते हैं। बावजूद किसी ने उन्हें वोट नहीं दिया। महासचिव कृपलानी ने पीसीसी के चुनाव की पर्ची गांधी की तरफ बढ़ा दी।

गांधी ने कृपलानी की तरफ देखा। कृपलानी समझ गए कि गाँधी क्या चाहते हैं। उन्होंने नया प्रस्ताव तैयार कर नेहरू का नाम प्रस्तावित किया। उस पर सबने दस्तख़त किए।

Mahatma-Gandhi

पटेल ने भी दस्तख़त किए। अब अध्यक्ष पद के दो उम्मीदवार थे। एक नेहरू और दूसरे पटेल।

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तो ऐसे बने नेहरू भारत के प्रधानमंत्री

उस दौर के पार्टी महासचिव कृपलानी ने अपनी किताब 'गांधी हिज लाइफ एंड थाटॅ्स' में इस पूरी घटना को विस्तार से बताया है।

नेहरू तभी निर्विरोध अध्यक्ष चुने जा सकते थे जब पटेल अपना नाम वापस लें। कृपलानी ने एक कागज पर उनकी नाम वापसी की अर्जी लिखकर दस्तख़त के लिए पटेल की तरफ बढ़ा दी।

PM-Pt-Nehru

लेकिन पटेल ने दस्तख़त नहीं किए और उन्होंने ये पुर्जा गांधी की तरफ बढ़ा दिया। गांधी ने वो कागज फिर पटेल को लौटा दिया। इस बार सरदार ने उस पर दस्तख़त कर दिए।

कृपलानी ने ऐलान किया,''तो नेहरू निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाते हैं.'' और इसी के साथ देश को नेहरू के रूप में पहला प्रधानमंत्री मिला।

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