वायुसेना ने रचा इतिहास, पहली बार डिसेबल कैडेट को किया शामिल, जानें पहले क्या था नियम

वायुसेना ने रचा इतिहास, पहली बार डिसेबल कैडेट को किया शामिल, जानें पहले क्या था नियम

Disabled Cadet in Airforce

Disabled Cadet in Airforce: वायुसेना के फ्लाइंग ऑफिसर, योगेश यादव (Flying Officer, Yogesh Yadav) इन दिनों सुर्खियों में हैं। इसकी वजह हैं उनके डिसेबल होने के बावजूद वायुसेना में शामिल होना। दरअसल, वायुसेना ने अपना इतिहास बदल दिया है और देश में पहली बार किसी डिसेबल कैडेट को वायुसेना में शामिल किया गया है। योगेश सेना में शामिल होने से पहले ट्रेनिंग के दौरान चोटिल हो गए थे। इस कारण से उनका कमर के नीचे वाला हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया था। हालांकि अब एयरफोर्स ने इन्हें अपना स्पेशल केस मानते हुए ऑफिसर के रूप में शामिल कर लिया है।

इस कारण से वे लकवाग्रस्त हो गए थे

बतादें कि साल 2018 में तेलंगाना के डुंडीगल स्थिल वायु सेना अकादमी में पासिंग आउट परेड से कुछ दिन पहले योगेश यादव के ट्रेनिंग विमान में खराबी आ गई थी और इस कारण से उन्हें पैराशूट का सहारा लेकर कूदना पड़ा था। इस दौरान उनका पैर फ्रैक्चर हो गया था और कई अन्य चोटें भी आई थीं। इस चोट के कारण धीरे-धीरे उनके कमर के नीचे वाले हिस्से में लकवा मार गया था।

वायुसेना प्रमुख ने खुद किया शामिल

दुर्घटना के कारण उनका वायु सेना में पायलट बनने का सपना भी टूट गया। लेकिन शुक्रवार को इसी अकादमी में हुए पासिंग आउट परेड में खुद वायुसेना प्रमुख, एयर चीफ मार्शल वी आर चौधरी ने पीपिंग सरेमनी में एयर फोर्स में फ्लाइंग ऑफिसर के तौर पर उन्हें शामिल किया।

पहले क्या था नियम

बता दें कि शुक्रवार से पहले तक अगर एनडीए , आईएमए ऐर एयरफोर्स एकेडमी में ट्रेनिंग के दौरान कोई कैडेट विकलांग हो जाता था तो उन्हें स्टाइपन के साथ सेना से निकाल दिया जाता था। लेकिन यह पहली बार है जब किसी डेसेबल कैडेट को वायुसेना में शामिल किया गया है।

योगेश पीछे हटने के लिए तैयार ही नहीं थे

गौरतब है कि योगेश यादव का मामला संसद में भी उठाया गया था, साथ ही तत्कालीन CDS जनरल बिपिन रावत ने भी इन्हें इंसाफ दिलाने का वादा किया था। वहीं अगर रक्षा मंत्रालय के रिकॉर्ड्स को देखें तो वर्ष 1985 से अबतक देश में कुल 448 डिसेबल्ड कैडेट्स हैं। जिन्हें सैन्य एकेडमी से बोर्ड-आउट किया गया है। वहीं योगेश यादव हार मानने के लिए तैयार नहीं थे। वे अपना प्रशिक्षण पूरा करने और भारतीय वायु सेना में शामिल होने के लिए एकदम दृढ़ थे। शुक्रवार को उन्होंने अकादमी से सफलतापूर्वक स्नातक पूरा कर लिया है और अब एकाउंट ब्रांच में एक फ्लाइंग ऑफिसर के तौर पर अपनी सेवाएं देंगे।

युवाओं का मनोबल पहले टूट जाता था

गौरतलब है कि हर साल देश की रक्षा का जज्बा लेकर युवा फौजी सेना में शामिल होना चाहते हैं। चार साल की कड़ी मेहनत के बाद वह अकेडमी से निकलकर भारतीय सेना, नेवी या एयरफोर्स में शामिल होते हैं। हालांकि कड़ी ट्रेनिंग के दौरान कई कैडेट चोटिल भी हो जाते हैं और उन्हें सेना डिसेबल मानकर बाहर कर देती है। ऐसे में युवाओं का न सिर्फ मनोबल टूटता है बल्कि सेना में शामिल होने से भी लोग हिचकते हैं।

रक्षा मंत्रालय को भेजा गया है प्रस्ताव

पहले सेना की तरफ से पूरी तरह से मुंह मोड़ लिया जाता था। न कोई आर्थिक मदद दी जाती थी और न ही इलाज में कोई सहायता किया जाता था। लेकिन इसी साल जून में भारतीय सशस्त्र सेनाओं (आर्मी, नेवी और एयरफोर्स) में डेसेबल कैडेट्स को आर्थिक मदद और इलाज में मदद देने का प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय को भेजा गया है। उम्मीद है कि इस पर जल्द ही फैसला लिया जा सकता है।

क्या-क्या है इस प्रस्ताव में

इस प्रस्ताव में कहा गया है कि आर्मी के पेंशन रेगुलेशन में कैडेट्स को भी शामिल किया जाए। साथ ही डिसेबिलिटी पेंशन और फैमली पेंशन में भी बदलाव किया जाए। अगर कोई कैडेट डसेबल हो जाता है या उसकी मौत हो जाती है तो उसकी आर्थिक मदद की जाए। साथ ही लेफ्टिनेंट की सैलरी के हिसाब से पेंशन दी जाए। इसके अलावा उन्हें पूर्व सैनिकों की तरह हेल्थ ईसीएचएस में शामिल किया जाए।

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