Dharampal Saini: जानिए 'बस्तर के गांधी' की कहानी, जिन्हें नक्सली भी सम्मान देते हैं -

Dharampal Saini: जानिए ‘बस्तर के गांधी’ की कहानी, जिन्हें नक्सली भी सम्मान देते हैं

Dharampal Saini

रायपुर। छत्तीसगढ़ के जिन बीहड़ो में जाने से सरकार के लोग भी कतराते हैं, वहां 91 साल के धर्मपाल सैनी (Dharampal Saini) मध्यस्थ बनकर पहुंच गए और उन्होंने कोबरा कमांडो राकेश्वर सिंह मन्हास (Rakeshwar Singh Manhas) को नक्सलियों के कब्जे से रिहा करा दिया। बता दें कि यह कोई पहला मौका नहीं है जब धर्मपाल सैनी नक्सलियों (Naxalite) और सरकार के बीच सेतु बने हैं। वे अक्सर संवाद की राह बनाते रहे हैं। ऐसे में आइए जानते हैं, कौन हैं धर्मपाल सैनी…

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बस्तर से उनका 1960 के दशक से नाता है

राकेश्वर सिंह की रिहाई के बाद उनकी चर्चा जोरों पर है। सैनी को बस्तर में लोग ताऊजी या फिर बस्तर के गांधी (Gandhi of Bastar) के नाम से जानते हैं। सरकार ने भी उन्हें पद्मश्री (Padmashree) से सम्मानित किया है। वे करीब 6 दशकों से बस्तर के लिए काम कर रहे हैं। इस कारण से आदिवासी और नक्सली भी उनका सम्मान करते हैं। कभी विनोबा भावे (Vinoba Bhave) के शिष्य रहे धर्मपाल सैनी का बस्तर से 1960 के दशक से नाता है। उन्होंने बस्तर की हजारों बेटियों का जीवन बदला है और आज भी वे इस काम में अनवरत जुटे हुए हैं।

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बस्तर की एक खबर ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था

मूलत: मप्र के धार जिले के रहने वाले धर्मपाल सैनी 60 के दशक में एक अखबार में बस्तर की लड़कियों से जुड़ी एक खबर पढ़ी थी। जिसमें दशहरा के आयोजन से लौटते वक्त कुछ लड़कियों के साथ कुछ लड़के छेड़छाड़ कर रहे थे। इसके बाद लड़कियों ने उन लड़कों के हाथ-पैर काट कर उनकी हत्या कर दी थी। इस खबर ने उन्हे अंदर तक झकझोर कर रख दिया। उन्होंने फैसला किया कि वे बच्चियों की ऊर्जा को सही स्थान पर लगाएंगे और उन्हें इसके लिए प्रेरित करेंगे।

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अपने गुरू से लेनी पड़ी थी परमिशन

जब वे बस्तर जाने के लिए तैयार हुए और अपने गुरू विनोबा भावे से परमिशन लेने पहुंचे, तो भावे नहीं माने। परंतु सैनी जिद पर अड़े रहे। इसके बाद भावे ने उन्हें अनुमति दे दी और एक शर्त भी रख दी कि वे कम से कम 10 साल तक बस्तर में ही रहेंगे। इसके बाद 1976 में सैनी बस्तर आए और तब से लेकर अब तक वहीं के होकर रह गए। कभी अपने समय में एथलीट रहे धर्मपाल सैनी ने अब तक बस्तर में 2 हजार से अधिक खिलाड़ी तैयार किए हैं।

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बस्तर के बच्चे भी आसानी से 15-20 किलोमीटर पैदल चल लेते हैं

सैनी बताते हैं कि जब वे पहली बार बस्तर आए तो उन्होंने देखा कि छोटे-छोटे बच्चे भी 15 से 20 किलोमीटर आसानी से पैदल चल लेते हैं। इसके बाद उन्होंने इन बच्चों के स्टैमिना को स्पोर्ट्स और एजुकेशन में यूज करने का प्लान तैयार किया। साल 1985 में उन्होंने पहली बार अपने आश्रम की छात्राओं को स्पोर्ट्स कॉम्पिटीशन में उतारने का फैसला किया और आज आदिवासी इलाकों में साक्षरता को बढ़ाने में उनका योगदान अहम माना जाता है।

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सैनी ने शिक्षा की अलख जगाई

जब सैनी पहली बार बस्तर पहंचे थे तब वहां का साक्षरता दर 10 प्रतिशत भी नहीं था। लेकिन वहीं साल 2018 में ये बढ़कर 53 प्रतिशत हो गया। हालांकि, आदिवासी बहुल इलाको में आज भी ये ग्राफ काफी पीछे है। लेकिन इस बात को भी हर कोई मानता है कि बस्तर में शिक्षा की अलख जगाने में धर्मपाल सैनी ने अहम योगदान दिया है। इसी के चलते उन्हें साल 1992 में पद्मश्री सम्मान से भी सम्मानित किया गया था।

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